शिकायत भी किससे करूँ जाकर
हर जगह तो तू ही है
बहुत ख़ता था में सबसे, जब तक जाना नहीं
वक़्त नहीं बदलता , बस वक़्त के साथ ज़रूरतें बदल जाती है,
ऐसा नहीं हमारे आलम-ऐ - दीवानगी में दम काम था
बात समझ गये हम दोनों अब समय बहुत कम था
जो वो इतना समझ जाता कि प्रेम की गहरायी में डूबा जा सकता है
तो ऊँचाई में उड़ा भी जा सकता है
उसके प्यार करने का अन्दाज़ सबसे अलग था
कुनकुना पानी सा नहीं
उबलता लावा सा वो हर वक़्त था
अगर चार लोग भी गाली ना दें
तो जीवन बशर्ते अच्छा जिया पर सच्चा ना जिया
महफ़िल में ही हो रही थी मेरे क़त्ल की त्यारी
जो पहुँचा तो बोले बड़ी लंबी उम्र है तुम्हारी
बात रीति रिवाज़ो की होती
तो जितने लोग उतने
I don’t want you to know yourself
I don’t think you know yourself
All I want you to know
That you know
That you don’t know yourself
ये जीवन में सपना है
या सपने में चल रहा जीवन है
जो भी है हर हाल में
एक दिन टूटता है
और सब कुछ छूट्ता है
ख़ुद को सम्भालिये कितनों की बैसाखी हैं आप
सैलाब आ जाता है अगर सूरज का ताप बढ़ जाये
पाने की चाह में उसको ,खो दिया ख़ुद को
ना मिला वो, ना मिल पायी ख़ुद को
दोस्त बहुत नहीं थे उसके
सच बोलने की बुरी आदत जो थी उसको
पेड़ों से दोस्ती हो गई है मेरी
बुरा नहीं मानते २ गाली भी दे दूँ तो
ख़ुद को पाने की तलाश में भटकता पेड़ों के बीच
खो कर सब कुछ, फिर लौट जाता हूँ घर को
प्रेम पूरा तभी होता है जब आधा अधूरा होता है
वरना मिलती ना जगह अधूरे चाँद को भोले के माथे पे
लोगों को अक्सर कहते सुना है
वक़्त की बहुत कमी है
कभी ख़ाली बैठ के देखो
भर देगा तुम्हारा कोना कोना
ऐ ख़ुदा एक सीमा होती है तजुर्बों की
बहुत पका हुआ फल सुगंध नहीं गंध ही देता है
में ख़ुद को मुमताज़ समझ बैठी थी
वो दिखावे की दुनिया का शाहजहाँ जो ठहरा
तक़दीर में मेरी ताजमहल लिख दे
दफ़ना दे मुझको, करे कोई इश्क़ हमसे भी इतना गहरा
छिपा के रखना अपने महबूब को पलकों में
यहाँ पलक झपकते ही चुरा लेते हैं लोग
अगर होती दुनिया सबके लिए एक जैसी
तो मुझे मुजरिम और तुझे बेक़सूर ना ठहराया होता
दुनिया में होता कोई अगर अपना
सच हो जाता जो चल रहा ये सपना
एक रिश्ता उसूलों के सूली चढ़ गया
एक रिश्ता दिल- ओ -दिमाग से उतर गया
मेरी बेचैनियों की वजह तू नहीं
मेरी बेचैनियों की वजह से तू था
जब पाया ख़ुद को बिलकुल अकेला
तो लगा तू ज़िंदगी में बेवजह ही था
बड़े प्यार से बना रहा था मैं आशियाँ अपना
आंगन का पेड़ जब तोडा, तो एक घोंसले को गिरते देखा
तुम्हारी सुनायी हुई बातों पर भरोसा नहीं हमको
तुम्हारी सुनायी हुई बातों पर भरोसा नहीं हमको
एक कहानी के लिये दो किरदार तो लगते हैं
महबूब अब दूरी बनाए रखता मेरा
फिर सुबह उठ कहता क्या चाँद सा चेहरा तेरा
उसकी नज़रों का कमाल था
की ख़ुद को समझ बैठे हम विलायती शराब
उसके रुखसार पर तिल बहुत थे
ख़ूबसूरती की पहरेदारी के लिए दरबान तो बैठाने पड़ते ही हैं
बड़ी ख्वाहिश थी कुछ कर गुजरने की
फिर कुछ फ़क़ीरों को बेफिक्र हुए गुजरते देखा
क्या कुछ नहीं पाया पर बहुत कुछ खोया
ख़ुशी की धागों में मैंने आँसुओं को पिरोया
मिट्टी थी विलायती, देसी बीज बरबस (जबरदस्ती, फिजूल) बोया
जागा तो सब लूट गया, बड़ी गहरी नींद मैं सोया
कहाँ कोई अपनों से छूटकर, रिश्तों से रूठकर खुश रह सका है
कभी पतझड़ की सूखी पत्तियों से पूछना
सच नहीं बोलो, अब तुम मुझसे
तुम बस झूठ ही बोलते रहो
कुछ पल और जी लेने दो मुझको
मैं सोना हूँ पारस की ज़रूरत नहीं मुझे
कभी बादल की तरह जी के देखो
बदलो समय पर और बहो हवा के साथ
बदलने में मुझको, ये उम्र तूने तमाम की
काश कुछ समय ख़ुद को समझने में लगा देता
बशर बोला -
मैं नासमझ ही तुझे एक मॉड पे छोड़ आया
खुदा बोला -
बस हर तरफ़ ख़ुद को में ढूँढता फिर रहा हूँ
ना गिला रहे ना शक शिकवे बचे
जो बैठे देखा उस ख़ुदा को तुझमें
इस बाज़ार से बहुत मुखौटे ख़रीद लिये हैं मैंने
कभी राम कभी रावण बनके, लीला करने की तैयारी है
हर बात पे जिसके आँसू आते हैं
अभी ख़ाली पन्ने जैसा मन रखते हैं वो
कोई दो शब्द लिख दे काली स्याही से
उसकी मोहब्बत की जंजीरो ने,
की तोड़ने की हिम्मत, मैं जुटा नहीं पाया
वो खुदा उतरता उसकी ज़ुबान से
कभी तारीफ़ों के पुल बनाता, कभी सब्र के बांध तोड़ जाता
बीते पलों के एहसासों को जब भी समेटती हूँ
वो सिमट आता है एक और शायरी बनके
एहसान मानती हूँ तेरी बेवफ़ाई का
ख़ुदा से मुलाक़ात करा दी मेरी
दुनिया के लिए ख़ुद को बदल दिया इतना
की अब मेरा अक्स भी मुझे पहचानने से इनकार करता है
कोई पूछने आता नहीं मुझे मेरे घर में
सोचता हूँ तस्वीर में घर बना लूँ अब
उसकी यादें उसकी तरह बेवफ़ा ना निकली
बहुत साथ दिया तनहाइयों में मेरा
अगरबत्ती महका देती है महफ़िलें कितनी, जब जलाई जाती है
तू भी जला जिश्त (ख़राब) खुदी में, महका आशियाना अपना
तेरी यादें जब बेवफ़ा हो गई
तो आँसू आये मुझसे वफ़ा दिखाने को
एक अरसा तेरी तस्वीर के साथ सोयी
आरज़ू थी तुझमें समाने को
शिकवे में शैतान, मोहब्बत में महबूब ख़ुदा होता है
उनके प्यार में बड़ी गहराई रही होगी
आज तक निकलने का रास्ता ढूँढ रहे है।
आख़िर इस प्रेम को मंज़िल मिल ही गई
अब पूछता नहीं वो आने में इतनी देर कैसे कर दी
उसकी ख़ामोशी में गूंज बहुत थी
हम नाहक ही शब्दों के ढोल बजाते रहे
सुना था प्यार में लोगों के पर लग जाते है
मुझे भी लगे पर, पर सोने के
पता नहीं मैं कब पीछे छूट गया
चाहकर भी वो होता नहीं जो हम चाहते हैं
हो जाता अगर तो इस ख़ुदा को पूछता कौन
उस दिन ख़ुद को पाकर उसको खो दिया मैंने
इस ज़िन्दगी से एक सौदा कर लिया मैंने
एक हाथ से तो बस थप्पड़ ही लगता है
वो मेरा महबूब ख़ुदा बन जाता
बोलता नहीं कुछ, बस सुनता जाता
सपनों के धागे में पिरोती और वो बुनता जाता
वो खुदा मेरा कभी देता इतना कि सँभाला ना जाये
और कभी लेता इतना कि संभला ना जाये
पर तो हमारे भी थे
बस सोने के थे तो बेच आये तेरे शहर में
उसने इबादत में माँग लिया मुझको खुदा से
जुदा कर खुदा से, वो मेरा ख़ुदा बन बैठा
एक अरसा लगा हमे हम होने में, तुम्हें तुम होने में
एक अरसा लगा ग़ैरों की गिरफ्त से निकलने में
सोचता हूँ क़ादिर जाऊँ तो जाऊँ कहाँ
ना कोई गिरफ़्त बची ना कोई गिरह (उलझन)
उन मकड़ियों के जालों ने लपेट लिया था हर और से
और तुम याद आए
साक़ी भरता बिन पूछे जो प्याला
और तुम याद आये
बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं था
कभी कलम नहीं मिली कभी कलाम नहीं हुआ
मेरे तसव्वुर से तस्वीर उसकी धुंधला रही थी
वो तो अब भी लगती क़यामत मेरे दोस्तों
बस मेरी ही उम्र बढ़ती जा रही थी
बहुत इंतज़ार किया उसका, इस जिस्म ने, इस रूह ने
सब थक गये एक इंतज़ार के बाद, बस मैं नहीं थका
चालीस पन्ने थे मेरी ज़िंदगी की किताब में
उसने बस आधा पन्ना पढ़ के पूरा जान लिया मुझको
हर कोई किसी के प्यार में जीना चाहता है
बस क़समें मरने की लेता हैं हर कोई
कोई अनजान तारीफ़ें कर गया मेरी
और मेरे अपनों को बना गया अनजान
कोई कोमल रिश्तों को निबाहता चला गया
कोई फ़रिश्ता ही चाहिए इन्हें निभाने को
झूठे बर्तनों में कौन खाना पसंद करता है
पर परोसते हैं रोज़ ख़ुद को झूठे मन से हम
एक ख़ाली जाम की तरह हूँ में
पहले अकेले में भर लेता था ख़ुद को उसके प्यार से
अब तो भरी महफ़िलों से भी आधा लौटता हूँ
ख़ुदा, बनके शैतान उसमें
मिला गया मुझको मेरे ख़ुदा से
रोना कोई चाहता नहीं, पर रोतों को पसंद बहुत करते हैं लोग
हसनें से डरते हैं ,कहीं ख़ुशियाँ बिखर गई, कोई समेट ना ले जाये
रिश्तों में कुछ दूरियाँ बनाये रखो
तो पास होने का एहसास बना रहता है
ढूँढता जिसे पत्थरों में वो मिला नहीं मांस मज्जा में
जब ख़ुद में ढूँढने चला तो में पत्थर का निकला
बात नहीं करते वो
पर नाराज़ हो जाते हैं
ये अन्दाज़- ए- आशिक़ाना है उनका
जब से जाना तू कोई खोयी हुई रूह है मेरी ही तरह
अब ना तैश होता ना तरस आता
में माँगता रहा हर वक़्त तो कैसे उसे पाऊँ में।
वो है जो बन माँगे हर फ़रियाद मेरे पूरी करता है
बहुत आगे निकल गया था में
की अब अपने पैरों की टापें भी सुनाई नहीं पड़ती थी
खुश है कौन यहाँ -२
कोई उखाड़े दफ़न सीने में दर्द को तो पूछ लें
कोई उतारे १० निक़ाब चेहरे से अपने तो पूछ लें
कोई रुके और पकड़ने दे अपना हाथ तो पूछ लें
कोई करदे दिल के हज़ार टुकड़े तो पूछ लें
कोई उम्मीदों का हिजाब चेहरे से उतारे तो पूछ लें
कोई ख़ुसूमत (animosity) का खंजर सीने में ना डाले तो पूछ लें
कोई हिज्र(जुदाई) में बीती रातों का हिसाब ना माँगे तो पूछ ले
वाह क्या दोस्त हूँ में मेरा
रिश्तों को नादानियाँ नहीं ज़्यादा नज़दीकियाँ करती है बर्बाद
हम नादानी में इतने नज़दीक आ गए
की आईना मैं देखती और अक्स उनका नज़र आताकी हिचकी उन्हें आती और पानी कोई हमे दे जाता
नींद मुझे नहीं आती और करवटें ले वो थक जाता
एक बार ख़ुद से रूरबरु होने में चला
तेरी गली से बैआब्रू हो में चला
और गया निकल, मैं कुछ इस कदर सबसे आगे
ख़ुद को भी पीछे छोड़, फिर में बढ़ चला
नफ़रत से कौन जीत पाया है किसी को
और इतना प्यार करने की हिम्मत किसमें है यहाँ
इस दिल को प्यार करने से फुर्सत ही कहाँ
नफ़रत करने को हमे एक और दिल चाहिए
अगर लोग उम्मीदें कम और उम्दा-जादगी (excellent life ) ज्यादा रखते
बातें बिगड़ने में एक लम्हा नहीं लगता
बनते बनते बातों को एक उम्र लग जाती है
अब तो बेजुबान चीज़े पूरी दास्तान कह देती हैं
वक्त निकालो और जानो ख़ुद को
जो जान गया ख़ुद को , तो वक़्त ना लगेगा दूसरों को जानने में।
जब ख़ुद से मिला मैं, तो वो भी मिल गया कभी इसमें कभी उसमें
मेरे लफ़्ज़ों के बीच छिपे ज़ज़बस्तों को
ये रिश्ते रूहों से शुरू और ख़त्म होते है
जिस्म तो बस एक ज़रिया बनता है
मुश्किल सफ़र अपनाता है कौन ,
जिसके लिए जो सफ़र था आसान
वो उसका ही मुसाफ़िर बन गया
दोनों छू रहे थे बुलंदियों कुछ इस तरह
की हारना अब किसी का भी नामुमकिन था
करते रहे प्यार का इज़हार सरेआम
इतराते रहे पहन के इश्क़ का रंगीन चश्मा
होश आया जब ठहराए गए बे-अदब, बे-ईमान
एक दिन बहुत लड़ाई हुई
वो कहता ये मेरी खरीदी मूर्ति है
वो तूफ़ान आया था उसको गिराने को मिटाने को
चढ़ती जवानी ,बढ़ते क़द्रदानों का अपना एक नशा है
सपनों के सौदागर से तो पूछो
सपने जितने बिकते जाते, बढ़ता उतना नशा है
रातों रात बने रईस की आँखो में सोने की चमक तो देखो
विरासत में मिली वसीयत का नशा अलग ही होता है
चंद पन्नो पे छाप, अपनी ही ज़िंदगी की कहानी
लेखक अपनी कलम से ही नशा कर लेता है
बच्चो को डाँट, घर गृहस्थी में हर दिन झूंझ कर
रात का सरदर्द ,औरत को नशे में चूर कर देता है
कोई बात नहीं, वो देखे दिन या रात नहीं
बीवी से उलझने में, आदमी होने का नशा ही कुछ और होता है
नशा बहता नहीं सिर्फ़ जाम में, नस नाड़ियों में सबकी बहता है
पूछो अपने रोम रोम से, कौन सा नशा तुम्हें सुरूर देता है
दो तरह के नहीं हर तरह के लोग होते हैं
बस आँखें एक तरह की चाहिए सबको जानने को
में मोहब्बत का सुरूर नहीं। जुनून सा ज़रूरी था उसके लिए
जो उतरा जूनून तो मुहब्बत का सुरूर भी न बचा
आजकल नया इश्क़ हुआ है उन्हें
शराब ने जगह ले ली है मेरी
इंतज़ार रहेगा वो बेवफा हो, वो रुखसत हो जिस दिन
तुर्श रुखसार ( ill nature bad temper) मिज़ाज भी भायेगा मेरा
जो बदल जाये जुनून के साथ ऐसा इश्क़ तो इंसान करते हैं
फ़रिश्ता बनना हो तो फ़रिश्ता ही चाहिए दिल लगाने को
काश मुहब्बत के मकान तक मैं पहुँच पाती
बस जुनून की सीढ़ी से चढ़ी और उतर गई
नशे में हर वक्त मैं रहती हूँ
अब साक़ी महख़ाने की ज़रूरत नहीं
लोग कहते है आप पीती नहीं
हाये कैसे ज़िंदगी की शामें जीती नहीं
बोतल पी जाती हूँ पूरी
पर चलता किसी को पता नहीं
मेरा साकी रहता मेरे अंदर
जाम बनायेवही, दिन रात पिलाये वही
—————————————— on blogger
आज थोड़ी गुफ़्तगू करेंगे
चार बातें बुरी लगें , तो भी रूबरू करेंगे
एक अरसा हुआ बैठे अपने साथ
तस्सली से अपनेको अपने में ही जुस्तजू ( to find , search) करेंगे
बहुत रोया जब पाया “मैंने” सब खोया
जब खोया “मैं” , तब चैन से मैं सोया
इंसान इंसान को क्या देगा
वो तो पथरों से भी मांगने की हिमाक़त रखता है
ना कोई गुनाह ना गद्दारी ना करी बेवफ़ाई
हम सज़ा काट रहे हैं ख़ुद से इश्क़ लड़ाने की
हम सज़ा काट रहे हैं बस बेपरवाही की
बहुत ख़ूबसूरत इल्ज़ाम तब लगाया उसने
बेवफ़ा कह दिया जब हमने इश्क़ लड़ाया ख़ुद से
ग़लतियाँ ना करोगे तो सीखोगे कैसे जनाब
सोफे पे बैठ के किताब पढ़ी जाती हैं, लोग नहीं
अच्छा हुआ ज़िंदगी ने हमारी मुलाक़ात करा दी
वरना बिना तजारिब (experience ) किए अपना, ये ताबूत हो जाती
ज़िंदगी तो अपनों के साथ बितायी जाती है
उम्र बिताने के लिए जानना भी ज़रूरी नहीं
पहले ढूँढते थे कोई पास बैठ जाये हमारे
अब बचते फिरते, पास, आ ना जाये कोई
कितने बदल गए हम तुम
घंटों निकल जाते , गुफ़्तगू का दौर चले
अब तो खामोशी इतनी है की साँसो की आवाज़ ही सुनती
कितने बदल गए हम तुम
बैचैनियों का सैलाब उफनता जो दूर चले जाते
अब तो ठंडे पानी का तालाब बने घंटों तकते रहते
कितने बदल गए हम तुम
जश्न ए मुहब्बत की नुमाइश करते हर शाम
अब तो हिमाक़त भी नहीं करते पकड़ने का हाथ
अब तो नज़रें चुरा लेते या झुका लेते अजनबी बनके
कितने बदल गए हम तुम
जो भूल जाते सलीका, तो माँग लेते अगले पल माँफी
अब तो निकल जातें है कितने ही दिन, बदसलूकियाँ भूले
खुशमिज़ाज लगता नहीं पर खैरियत सबकी पूछता है
नाराज़ सा चेहरा रखता है मगर नज़दीकियाँ ढूँढता है
ना उनको गुरूर था, पर इतना ज़रूर था
वो जानते थे , मुझको मुझ से भी ज़्यादा
शिद्दत से चाहा, चाहे कितना वो शुरूर( दुष्ट) था
जौहरी की आँखों वाला, मैं उनका कोहिनूर था
नज़रों में क़ैद कर, लगा नसीहतों का ताला
गुम जवाबी की चाबी, तोड़ने को ताला, मैं मजबूर था
शायरी में उसे लिख नहीं पाती
शराब की बूंदो में उसे पी नहीं पाती
बता दे कोई मुझे प्यार करने का तरीका
सांसे लेती हर वक्त ,पर वक़्त पे जी नहीं पाती
नज़दीकियाँ नराजगियों में ना बदल जाये
इसलिए मुलाक़ातों से डरता हूँ मैं
भर पाता नहीं कोई ख़ाली कमरा मेरा
दिन महीने साल यूहीं गुज़रते रहे
हम तो बस कैलेंडर के पन्ने बदलते रहे
इंतेज़ार रहता है अपनों से, कुछ प्यार भरे शब्दों का
पाके मुबारकें उनसे हर साल, हम यूहीं संभलते रहे
अब तन्हाइयों में तकल्लुफ़ नहीं
अकेलेपन का हम मज़ा लेते हैं
ये दूरी दरमियान अब तेरे मेरे
वो अपना होने की सज़ा देते है।
सब ढूंढ रहे अपनी अपनी ख़ुशी
कोई मीलों पैदल चल गया
कहता शाही स्नान है
साँस अंदर बाहर कर
कोई कहता यही ध्यान है
सब ढूँढ रहे अपनी अपनी अपनी ख़ुशी
कोई प्यार में है टूटता
संसार सारा तब छूटता
जिस्म को ज़रिया बनाया
ढूँढने को रूह की रहगुज़र
सब ढूँढ रहे अपनी अपनी ख़ुशी
दिल काँच सा कोई टूटता
पर खरोच नहीं तस्वीर पर
उस काँच को कौन पूछता
बस तस्वीर की करते सब क़दर
सब ढूँढ रहे अपनी अपनी ख़ुशी
जो जग गया वो चल पड़ा
सबसे जगत में लड़ झगड़
जो सो रहा वो जग गया
रोकने को रिश्तों में रगड़
सब ढूँढ रहे अपनी अपनी ख़ुशी
कोई ले मज़ा धक्का मुक्की में
दिन में दो चार गाली तो दो
कोई लिए है छुट्टी, पैर पसारे
भरपूर आराम बाद, व्यंजन भरी थाली तो हो
सब ढूँढ रहे सब अपनी अपनी ख़ुशी
कोई शब्दजाल में झूझ रहा
कोई शब्दों के जंगल में घूम रहा
मोह के दरिया में कोई तैर गया
सब ढूँढ रहे अपनी अपनी ख़ुशी
कलम कदम-सी बढ़ती रहती
सब ढूंढ रहे अपनी अपनी ख़ुशी
भरे बादलों सी ज़िंदगी
ना रुकती ना एक सी दिखती
बस बहती हवा के हौंसलो से
टकराने को चट्टानों से
और रो देने को नादानियों पर
जो जैसा था उसने वैसा जाने मुझे
किसी ने खुदा किसी ने खुदगर्ज माना मुझे
इन पलों को ना बंद कर आँखों में
कलम की स्याही में, ना जज्बातों में।
बह जाने दे सूखे पत्तों की तरह
में झूठे ही उस रब की इबादत करता हूँ
चेहरे दो रख लिए एक रोज़
एक दुनिया का दोस्त और एक मेरा दोस्त
ना बातों का,ना जज़्बातों का
भरोसा ना कीजिए, इश्क़ में इबादतों का ।
दलीलें ये दिल, कितनी भी दे
बढ़ते कदम किस ओर, है इस दिल के
बस इतना तुम पहचान लेना ।
तू माँझा में पतंग
एक दिन हम उड़े आसमान में
इठलाते इतराते
हम रहते अपने अपने जहान में
फिर एक दिन पतंग को गुमान आ गया
मंझा को बोली तू दिखता है कहाँ
नज़रों का ताँता बस मुझे देखता है
उड़ने को अब ये गगन कम पड़ रहा है
मंझा बोला, बड़े दुखी मन से
सभी कोशिशें की तू उड़े खूब ऊँची
तेरी ऊंचाइयों की चाह से डर अब रहा हूँ
तू अलग हो अब, में ख़ुद को तुझसे जुदा कर रहा हूँ
कुछ देर पतंग को, पता कुछ चला ना
वो गुमान में थी, वो उडी बहुत ऊँचा ।
संभलना जब मुमकिन, हुआ ना उससे
मांझा न अब, दिखाई उसको देता
घबराहट के बादल ने आसमान आ घेरा
तरसी पतंग, फिर देखने को सवेरा
पर देर बहुत हुई, आ गिरी धम्म ज़मीन पर
मांझा वहां करता इंतज़ार अब मेरा
बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं
शायद शब्दों की नहीं तजुर्बों की कमी ही रही थी
पर अब ढूँढ रही हूँ तरीका, कुछ नायाब
तुझे प्यार करने को
वो हवा का झोंका बनके आया मेरी ज़िंदगी में
में मिट गई कुछ इस तरह, जैसे बादल मिटे आसमान में
प्यार करता हर कोई, बस प्यार खुद से है करता
कोई चाहता आपको, पर प्यार से पहले खुद को है भरता
कुछ खुलता है तो दर्द होता है
बीज तोड़ ज़मीन पोधा होता है
सिरदर्द दिमाग़ वालो को ही होता है
बूंदी भरा बादल ही सबको भिगोता है
जब खुलती है आँखें इस दिल की
तभी तो आंसुओं से ये दिल रोता है
बड़े दिन हुए बरसात नहीं हुई
भरे बादलों को भरी आँखों से देखता हूँ में
मेरी तनहाइयों में भी कितना शोर था
कोई पास नहीं फिर भी में भाव विभोर था
कोई दिल में बैठा बोलता
कोई दिमाग़ में बैठा बोलता
मेरे ठहाकों में ढक गई मजबूरियाँ मेरी
मेरे ठहाकों में ढक गए आहिस्ता से आंसूँ मेरे
मेरे चुटकुला सब हँसते, और में हँसते हँसते रो देता
टूटता है घमंड का घड़ा
अपने ना होने का एहसास भी होता है
बस एक गहरी खाई चाहिए उस एक ख्वाहिश की
जो हर पल और फैले और गहराये
में बुद्ध नहीं मीरा बन जाऊँ
घर भजन में कर, कृष्ण प्रेम की पाऊँ
में कृष्ण भाई गोपी बन जाऊँ
वियोग में तड़पूँ और रास रचाऊँ
में गोपी नहीं वृंदा वन बन जाऊँ
कृष्ण भूमि पे साधु संग पाऊँ
पाना चाहा तुझे मदमस्ती से मदिरा से मोहब्बत से
पर मिला नहीं दीदार
चाह को निकाल , किया अलग जब
तब जिया जी-दार (बहादुर )
बहुत दूर निकल गया था मिलने ख़ुद से
ऐ खुदा लौटने का कुछ वक्त तो दे
रहगुज़र पे गुज़रता था अकेला
पर शोरगुल ने पकड़ लिया
लोग नहीं बस्ती नहीं
फिर आती ये आवाज़ कहाँ से
मौसम से बदलते देखे हैं लोगों के चेहरे
बस समय का ही फ़र्क़ है
मौसम महीनों में और चेहरे पलों मे बदलते है
वो अपने रास्ते में अपने रास्ते
एक उम्मीदों से भरा हुआ
एक उम्मीदों से परे हुआ
कोई शराब में कोई शबाब में
कोई गीता की किताब में
कोई अल्लाह की अजान में
कोई खरीदारी करें हर दुकान में
क्या ढूँढ रहे सब किसी को कुछ पता नहीं
कुछ मिल गया तो फिर बैठे झूठे गुमान में।
कोई दोस्तों के सैंग में
कोई वैराग्य के रंग में।
कोई धूनी रामा के
कोई काला धन कमा के
कोई शब्दों की माला पिरोके
कोई गंगा में डुबकी से पाप धो के
सब भर रहे ख़ुद को सबसे
और बेख़बर हो रहे हर दिन हर वक़्त ख़ुद से
ख़ालीपन जिसका जितना, उतना व्यस्त उसे पाओगे
भरा हुआ जो प्रेम रस से, उतना मस्त उसे पाओगे
अपनी काबिलियत पहचान और मालकियत में रह
दूसरों के हुनर का गुलाम कब तक रहेगा
बस उसकी नज़रों का ही फेर था
आज में खुदगर्ज़ दीखता था जो कल तक उसका खुदा था
बड़ी मुश्किलों से “अपने”से मिलना होता है
यहाँ तो अपने ही आपको आपसे पराया कर देते है।
क्या ढूँढ रहे सब, ऐसा क्या पा लिया है
जो छूट रहा है हर पल, पल क्या जी भर जी लिया है
जिसने किया अकेला हमे
वो ही हम-नवा देगा मेरा साथ
या तो मिला देगा हमको हमसे
वो नामुराद ,दुनिया को शुक्रिया की शक्कर बाँटता फिरा, छोड़ के अपनों को तरसता
दूरिया दिलों की हो तो, पास कितना भी बैठे कोई, कोई छू नहीं पाता
वो अंदर से टूट इतना गया था ,की कोई बाहर खंजर भी मारता, तो दर्द उसे दे नहीं पाता
बहुत दिन हुए , कुछ हुआ नहीं
लगता, किसी ने दी बद्दुआ नहीं
लिखने को बेचैन कलम बहुत मेरी
पर क्या करें, ज़िंदगी ने फिर से हमे छुआ ही नहीं
अकेले होने में डर लगता है
कोई पास नहीं तब शैतान इस मन में जगता है
कोई मरने से डरता है
खाली मन कब किसका भरता है
कोई सो सकता नहीं रात अकेले में
कोई दिन में बेचैनियों से उलझता है
अकेले होने में डर लगता है
महफ़िलों में भी कोई तन्हा पाता ख़ुद को
कोई जाम को अपना हम-नवा बनाके
सलेटी शामें सतरंगी रंगो से भरता है
दुनिया के रंगों ने धुंधला दिया था, ये अक्स मेरा
फिर मिला मुझे वो, आईना दिखाने को कुछ इस तरह
पाला पोसा बड़ा किया ,करे कोई बाप जिस तरह
पर बहुत देर हो गई, ना जाने चला गया कहाँ, वो किस तरह
उसकी गुजारिश में मेरे किसी गुनाह की बू आती है
फुर्सत मिले ज़माने से तो हम से भी आके मिल कभी
बात समझ की नहीं समझौते की थी
ग़लत वो भी ना था, सही मैं भी थी
एक चाँद और एक मैं
साथी जन्मों के
साथ मेरे वो चलता
जब साथ कोई देता न मेरा
जब ख़ुद में मजा आने लगे
तो तुम अपने सबसे प्यारे यार बन गए
अब मंदिर महफ़िलों में क्या जाना
तुम ख़ुद में साक़ी ख़ुद में परवरदिगार बन गए
बहुत गुमान था उसको अपनी काबिलियत का
हमको भी तराश के उसने काबिल खुद सा बना दिया
कुछ होने में खो दिया उसको
ना उसका हो पाया, ना ख़ुद कुछ हो पाया
सोचता हूँ कैसा होगा वो आख़िरी पल
समेटें बीते पलों को ख़ुद में, खो जाने को हमेशा
वो बहुत दूर बेख़बर था सारे जहाँ से
पर जिसके क़रीब था वो उसका खुदा हो गया
न लोग बदलते हैं, न वक़्त बदलता है
इतिहास दोहरा रहा था शायद ख़ुद को
पहले वो मेरे पीछे था, अब में उसको ढूँढता फिरता
खून में उसके लावा का उबाल है I
बातों में बातें, पिरोता कई सवाल है ।
जाता जहाँ,वहाँ करता धमाल है I
सच का साथी, गीला करे झूठ का रूमाल है ।
ग़लतियों का ना इसे कोई मलाल है I
मज़े से करता ये बावला बवाल है ।
बेरुख़ी में कर देता, हिया को हलाल है I
पर जाने हर दिल की चाल और हाल है ।
वो कुदरत का करिश्मा, कीमती, कमाल है I
ख़्वाब ही नहीं, पूरा करता अपना हर ख्याल है ।
ये शक्स कोई मामूली नहीं
ये शक्सीयत बेमिसाल है
जो जीता इस पल में
यहाँ, यहीं, और कहीं नहीं
ना बीते का अफ़सोस
ना आने वाले पल की फ़िकर
वहां न ज़ज़्बातों को जगह है
मत क़ैद कर तस्वीरों में मुझे
खुल के इन लम्हों का लुत्फ़ उठा
हमें शिकायत रही ताउम्र की असली इश्क़ की समझ ना थी उनको
प्यार में शिद्दत को तलाशते , फिर उसने समझाना छोड़ दिया
अब एहसासों से नहीं एहतियातों से भर्ती हूँ ज़िंदगी की किताब
गीले पन्नो से तो शब्द भी रुख़्सत हो जाते हैं
एक खूबसूरत फूलों से लदे पेड़ सी हो ये ज़िंदगी अगर हर पल खुल कर जिया जाये
समेटने की होड़ ने पलों को, बदसूरत गुलदस्ता बना दिया है
अब ना तेरे आने का इंतज़ार था
ना जाने पे बेचैनी हुई
बस इत्मीनान था इतना
देर ही सही, पर आखिर पा ली तूने भी अपनी ख़ुशी
मंदिर में महकानों में शादी में जनाजों में
बड़ी बड़ी जगह तुझे ढूंढा ए ज़िंदगी
पर कम्बख़्त छिपी बैठी थी
उन छोटे छोटे कोनो में
कहते हैं दर्द देता वही है जो दर्द में होता है
पर दर्द लेता वही है जो ख़ुद से दूर होता है
कहते हैं शिद्दत से चाहो तो कायनात भी साथ देती है
अपने आँसू पोछने को या किसी के निकालने को
पूरी ज़िंदगी निकल गई उसे ग़लत साबित करने में
काश ख़ुद में झाँक लेता एक बार, उसके जाने से पहले
एक उम्र निकल दी ग़लतियाँ गिनने में उसकी
काश इतनी गिनती का प्यार कर लिया होता
तो वो आज मेरा होता
एक उम्र निकल जाती है ग़लतियाँ गिनने में सबकी
बशुमार प्यार छोड़ो, गिनकर ही प्यार कर लो सबको
तू गुलाब नहीं, जंगली फूल है वो
जो गुलदस्ते की बंदिशें पसंद नहीं करता ।
खुशबू खूबसूरती के लिए, उसे कोई तोड़ा नहीं करता ।
तू मौज में अकेला, आस पास के पौधों की परवाह नहीं करता
वक्त को जाया नहीं किया करते हैं न करते कोई फरमाइश
कुछ कदम तो चल, लड़खड़ा के सही
मंजिलें आती नहीं ख़ुद, तू कदम बढ़ा तो सही
कुछ साँसों में नाम उसका ले, बड़बड़ा ही सही
खुदा दिखता नहीं यूहीं, तू एक बार बुला तो सही
किसी रोज़ उठ भी जा कादिर, हड़बड़ा के सही
कुछ चलना भी ज़रूरी है कुछ पाने को
दौड़ने में मंजिल पीछे छूट जाती है
और रुकने में हम
एक दिन ऐसा करके देखो
कुछ ना करके देखो
बैठ जायो एक दिन, तुम ख़ुद के साथ
ख़ुद से एक दिन एक पल, मिल के तो देखो
एक दिन ऐसा करके देखो
कुछ ना करके देखो
फूल आए चले गए
पतझड़ कितने चले गए
आंधी आई चली गई
लू लपट भी चली गई
लोग आए चले गए, हमेशा के लिए
अपने होने का एहसास होता है
जब ये तन तेरे पास होता है
जब कोई अपने बहुत पास होता है
भूल जाती ख़ुद को खो जाती सुधबुध
वो अपना ही फ़रिश्ता परवरदिगार होता है
मापती है दुनिया मुझे मेरे कुछ शेरो से
कभी कोई मेरी गहरायी में उतर के तो देखे
कभी कोई मेरे साथ कुछ कदम चलके तो देखे
कभी कोई मेरा अपना होके तो देखे
कुछ नहीं तो अपना बना के तो देखे
सपने
कहाँ से आते हैं ये सपने
क्यों आते हैं सपने
कौन बनाता है सपने
कैसे बन जाते है सपने
आँखों से चलकर, दिल मे रुक जाते हैं सपने
जो होठों पे रूकते, तो पूरे हो पाते ना सपने
बैगानों को पल में अपना बना देते है सपने
अपनों से मीलों दूर ले जाते हैं ये सपने
नींद चुरा, बदले में बैचनियाँ दे जाते है सपने
बेसुध से लगते, पर होश जगा जाते हैं सपने
ख़ुद को खुदा समझ बैठता वो, जिसके पूरे हो जाते हैं सपने पर बैठता ख़ुद-सर (उद्दंडी) खुदा के पास, गर चूर चूर हो जाते हैं सपने
ख्वाहिश खुदा की, और झुका लिया ये सिर, गर चूर चूर हो जाते हैं सपने
हीरो कौन
जो २-२ इंच के डोले बनाता
जो हीरोइन का दिल है चुराता
कार क्या हवाई जहाज़ भी
जो आँख बंद कर
बचपन में अक्सर पूछती थी ख़ुद से
आई धरती पर आख़िर किस वास्ते
खोजे बीने, चले कुछ रास्ते
गर अंत है एक,तो भरूँ किस वास्ते
जीने लगी फिर अपनों के वास्ते
जवानी में ज़िंदगी ने दिए कुछ जवाब or चमकता हुआ जीवन का सूरज
सोचना कम, बस जीना भरपूर
नशे बिना ही, चढ़ा रहे सुरूर
ज़िंदा दिखूँ, तो चाहिए कुछ गुरूर
मरने से पहले , जीके भी देख लेना ज़रूर
ढलने को है अब जीवन का सूरज
जीना का अब फ़लसफ़ा समझ आया
मैंने सवालों से ज़्यादा संगीत गुनगुनाया
फिर कोई रास्ता , मुझको ना भाया
बनाके अपना रास्ता, मेरा दोस्त मेरा साया
शायद ख़ाली जाना पड़ेगा
फिर एक बार उसके दरबार से
रोज़ चढ़ता हूँ में पहाड़ उसका
इस उम्मीद में शायद एक दिन
एक पत्ता एक बूँद भर देगी
मेरे विचारों की स्याही को
खिला हुआ फूल
देखता कली को
कहता कैसा बंद बंद जीवन
कली भी फूल को देख मुस्कुराती
कोई तोड़ ले जाएगा तेरा जीवन
काश में इतना ना संभालता
बहती एहसासों की नदी में
अक्सर तारीफों के पुल बांध देता था
हाए फिर नज़र लग गई
वो लोहे का जिगर रखता
मेरी आँखें भी चुंबक से कम ना थीं
हाए फिर नज़र लग गई
महफ़िलों में ढूँढती दो निगाहें मुझको
महखानों में जाके कहीं खो गई
हाए फिर नज़र लग गई
दरियाँ आंसूओं का लिए घूमते थे हम
सूखी चट्टानों सी आँखें थम गई
हाए फिर नज़र लग गई
ना पलको में रहता ना पलों में मिलता
दूरियाँ नज़दीकियाँ बढ़ाये अब हर पल
हाय फिर नज़र लग गई
ख़फ़ा में उसकी वफ़ा का तो पता चलता
अब बातों ने कर दी बेवफ़ाई
हाए फिर नज़र लग गई
उनके जिस्म से होते हुए गुजरता रब का रास्ता
में रास्ता ढूँढता और लोग शैतान-ए-ल'ईं
The one who pose the best is the most evil among us.
For friends
जहाँ समय का होश ना रहे
बातों का सिलसिला कुछ इस तरह चले
चाय की चुस्की के कई राउंड्स है लगे
जम गई टोली, अब कोई ना टले
हाँ दोस्तों में कुछ तो बात होती है
कोई अपना गीत गुनगुनाता
कोई रखता शायरी का रूबाब
थिरकते मोर जैसा, मेरा एक दोस्त
हर दोस्त मेरा, महख़ाने की सबसे महँगी शराब
हाँ दोस्तों में कुछ तो बात होती है
जिस्म बहुत है
पर दो से धड़कता दिल इस दल का
खीर खिलाके ,कोई चाय पिलाके
कॉफ़ी की कशिश से करे कोई मुझे हल्का
हाँ दोस्तों में कुछ तो बात होती है
हँसी किसी की,जैसे झील का पानी
बोले कोई ,नदी सी बानी
हर दोस्त अजूबा, बड़ा अचंभा
शुक्र खुदा का यहाँ कोई ना ज्ञानी
हाँ दोस्तों में कुछ तो बात होती है
हँसी ठिठोली ,भर दें हर कोना
ख़ुशी ना सिमटे ,तो पड़े है रोना
रईसों को मैं अब रास ना आती
मेरे दोस्त बहुत है, और सब है सोना
हाँ दोस्तों में कुछ तो बात होती है
जहाँ घड़ी का अब कोई काम नहीं
बातों को भी आराम नहीं
चाय पे चर्चा होती सबकी
बचा ना कोई ,जिसकी खिंचे टाँग नहीं
हाँ दोस्तों में कुछ तो बात होती है
समय का होश हम मदहोशों को कहाँ
चार भी बैठ जायें ,जिस किसी के यहाँ
बातों का सिलसिला रुकते ना बनता
सैलाब में बह जाये, चाहे दुनिया जहाँ
हाँ दोस्तों में कुछ तो बात होती है
New
काश में सब कुछ भूल जाऊँ
काश में कुछ ना पाऊं
काश में अकेला हो जाऊँ
काश में फिर ख़ुद से मिल पाऊँ
शायद समय और समझ ही रिश्तों की गहराई और गरिमा बनाये रखती है
बड़ी क़िस्मत वाला था वो, जो उसे भूलने की बीमारी थी
में याद आ जाती तो तड़पना बहुत पड़ता
बहुत लंबे रिश्ते चलते थे पहले
शायद लोग कम बोला करते थे
पलों में कई ज़िंदगियाँ जिया करते थे
एक दूसरे को वक्त ज़रूर देते
पर अपना वक्त भी जिया करते थे
सपनों को पूरा करने में
अपनों को छोड़ा नहीं करते थे
सपनों की दुनिया में भी बहकर
अपनी जड़ों से जुड़े रहा करते थे
वो क्या हमें सज़ा देता
उसका रूठना हर बात पर हमको सजा देता
चौखट के सहारे खड़ी ताकती
पलकें बिछाए करती मेरा इंतज़ार
मेरी माँ तो ऐसी है
परेशान नहीं दिखती पर परवाह वो करती
देख मेरा चेहरा ,वो चहकती हर बार
मेरी माँ तो ऐसी है
रूठ में जाऊँ और खाना ना खाऊँ
वो नहीं रूठती, मुझे मनाती बारम्बार
मेरी माँ तो ऐसी है
ख़ुशी के पल , साँझा जो करने मैं जाती
आँखें नम , उसके आंसूँ बहने को तैयार
मेरी माँ तो ऐसी है
गोद में उठाकर मुझको और मेरा बस्ता
फिर गरम गर्म खिलाती, कभी दिया ना अचार
मेरी माँ तो ऐसी है
नाच स्पर्धा में लगा मोहल्ला
सजा धजा कर ,गुड़िया बना ,ले जाती कर तैयार
मेरी माँ तो ऐसी है
जो गुस्से में ,कभी वो आ जाती
कर देती बोलना बंद, और मैं घूमूँ लाचार
मेरी माँ तो ऐसी है
मेरी छोटी जीत को गाती
हार को पी जाती, ना लेती डकार
मेरी माँ तो ऐसी है
ब्रह्मांड जितना बड़ा दिल है उसका
लगते सब बेचारे, ना लगे कोई उसे बेकार
मेरी माँ तो ऐसी है
कभी जो बिखर जाती दुनिया मेरी
बवंडर मचाने का रखती वो अधिकार
मेरी माँ तो ऐसी है
कितना तेल ,डाला मेरे बालों में
आज अम्बानी होती,जो डाला होता आचार
मेरी माँ तो ऐसी है
मेरे लिए शॉपिंग करते नहीं थकती
मना करे जो , निकाले आँसुओं के हथियार
मेरी माँ तो ऐसी है
मेरे जाते ही, फिर एक सूटकेस निकलता
भरने फिर लगती , कितना करती है प्यार
मेरी माँ तो ऐसी है
बड़ा सुकून में पाती संभल के उसकी बाहों में
वो मिलता सुकून उसको डूबके मेरी आँखों में।
वो बनती नहीं थी अपनों से वो हल्का पत्ता पेड़ से गिर गया
आंधी तूफ़ान अंधेरे ने बहुत दूर उसे कर दिया
अब वापस जाने का रास्ता ना मिलता
वो पत्ता बहुत दूर कहीं खो गया
वो बनती नहीं थी अपनों से वो भारी फल पेड़ से गिर गया
आंधी तूफ़ान अंधेरे ने कोशिश की उसे दूर ले जाने की
वो पेड़ की छाया में ही पड़ा रहा
वो ना खोया ना दूर हुआ बस अलग हुआ
वो खुदा तेरा उतरेगा नहीं किसी आसमान से
वो आयेगा नहीं किसी और जहान से
वो तेरे अपनों में ही कहीं छिपा बैठा होगा
बस अपनी नहीं , कभी अपनों की सुन दिलोजान से
ज़िंदगी के थपेड़ों ने इतना सिखाया
इतना तो सोच भी नहीं था जितना दिखाया
अकेला ना तन्हा बस ख़ाली सा हूँ में।
भरता हूँ ख़ुद को ख़ुद से शाम सवेरे
ये देश
भीड़ बहुत है
सब भाग रहे कहीं
इस आपा धापी में
एक सुकून छिपा है
कठपुतली सा कोई
नचा रहा सब
ऊपर बैठ कोई
देख तमाशा रहा है
एक से बढ़कर एक लग रही
दुल्हन जैसे इंतज़ार में दुकानें
राहगीरों के काफिले में
दूल्हा एक दिन आयेगा
आँखें काम लगे काम पर
पैरों को फिर कैसे आराम
दुल्हन जैसे सज़ी दुकानें
बुलाकर मुझको करती बदनाम
रात होने पे यहाँ उठती सड़कें
लेके अपना ख़ुद का सूरज
नाचती गाती शिर मचाती
दिन के कोल्हल को दबाती
कठपुतली का नाच नाचता
देखो इंसान क्या ख़ुद पे इतराता
फिर धागे जीवन के हाथ किसी के
और कठपुतली का ख़ुद को पता
खंडहर चीख चीख सुनाते
दास्तानें और भूली कहानी
पेड़ों ने जब गाला है घोटा
जर्जर करती गिरि जवानी
कला से अपनी चावल को नचाया
कभी अचंभा कभी हसाया
देखने में सरल और सीधे
टेढ़ी कलाबाज़ी, पर ना ये डगमगाया
कीट पतंगे सांप बिच्छू सींकों पे
मीठे आलू मीठी परतो में
चावल के धागे उलझे सब्ज़ी में
गरम पानी में रहते टोफू के साथ
आज़ादी चलते फिरते विचारों से
आज़ादी दूसरों के कटाक्ष और बातों से
आज़ादी अपनेपैन के एहसानों से
आज़ादी व्यक्त किए सच्चे एहसासों से
आज़ादी पूरी ना हो पायी ख्वाहिशों से
आज़ादी दिल में क़ैद रह गए अरमानों से
आज़ादी खोए हुए सम्मानों से
आज़ादी मिले हुए अपमानों से
आज़ादी दूसरों के दिए विचारों से
आज़ादी सिखाए गए व्यवहारों से
आज़ादी न्याय करती निगाहों से
आजादी बहकती इंतज़ार भरी बाहों से
आज़ादी उन नज़रों से जो ढूँढती हर वक्त
आज़ादी उस मिज़ाज से कभी नर्म कभी सख़्त
आज़ादी परवाहों की पकड़ से
आज़ादी आज़ादी की अकड़ से
उसका हर सितम सिर आँखों पर था
हर जख्म को हमने नाज़ों से पाला था
उसे भी नहीं पता था
वो हमारी हमी से पहचान करा रहा था
बड़ी तस्सली हुई उसे तस्सली में सोया देखकर
एक मुद्दत के बाद कोई तस्सली से देख रहा था और कोई तस्सली से सो रहा था
मसाला ये नहीं था की कम हो गया था उनका प्यार
बस छिन गए थे कुछ नकली नक़ाब कुछ झूठे ख़्वाब
हर कहानी में २ पात्र तो लगते ही हैं
अकेले राम रामायण को चलाते भी कैसे
एक लंबा वक्त लगाया था एक चिड़िया ने उस घरौंदे को बनाने में
बस २ पल का वक्त लगा तूफ़ान को उसे मिटाने में
मेरी भूल थी जो भूल गया उसके समंदर से प्यार को
फिर भटकता रहा एक नदी के जैसे, खोजता उस समंदर को
वो उतरना चाहता था मुझमें एक कलम के ज़रिए
और में कलाम का उसको जरिया दिखा रहा था
अब तो चैन से तू भी सोजा और मुझको भी सोने दे मौला
थोड़ा आराम इस कलम को भी दे
वो फूल के काँटे हटाने में मशगूल था
और हम पंखुड़ियाँ ही चुनते रहे
वो कच्चा प्यार है जो सच्चा शायर ना बना पाये तुमको
शायरी तो पके प्यार की पहचान है
नानी की लोरी
कहे लाड़ो मोरी
बन दुल्हन चढ़े डोली
आयेगा दूल्हा
चढ़के ७ घोड़ी
उड़के ७ समंदर
बनाने को जोड़ी
नानी की लोरी
कहे लाड़ो मोरी
नानी की लोरी
बाँधे मोह की डोरी
रगड़ रगड़ साबुन
कर दे मुझको गोरी
कभी उबटन लगाये
गुड़िया सी सजाए
रखे काग़ज़ सी कोरी
नानी की लोरी
बाँधे मोह की डोरी
नानी की लोरी
कहे ओ री छोरी
तू चढ़ाये ना त्योरी
करे तू इतनी सेवा
तू खायेगी मेवा
अनमोल रतन तू
ना कर ले कोई चोरी
नानी की लोरी
कहे ओ री छोरी
हम खामखा। ख़ुद को इतनी तवज्जुव दे बैठे
जब देखा उसकी दो आँखें देखती थी कहीं और
काश में उसकी खूबसूरत ख्वाहिश ना होती
ख्वाहिशऐ अक्सर अधूरी रह जाती हैं
होती काश में एक संजोया सपना उसका
सपने अक्सर पूरे हो जाते है
में खोजता हर ओर, बैठा छिप के वो कहीं मुझमें
मृग भागे हर ओर, कस्तूरी छिपाये ख़ुद में।
बस तू उसकी इबादत कर
उसकी इज़ाज़त बिना ना मिलती इज़्ज़त ना मिलता इत्मीनान
उसकी उम्मीदों ने पकड़ रखा था दामन मेरा
जो लगा दाग दामन पे तो छुड़ा के चल दिए वो
ज़िंदा हूँ क्यों मैं ?
क्या ख़ुद को पाने को ?
या सब भुलाने को ?
याद कर जीता जो चले गये अपने
हर दिन मरता, पूरे करने को सब सपने
औरों की ख़ातिर ये जीवन जलाया
अपनों में ग़ैरों का अक्स जब पाया
ख़ुद का संभलना है अब कितना ज़रूरी
ये तजुर्बों से समझा, तक़दीर ने सिखाया
टूटी अंगुली जुड़ जाती है पर पहली वाली बात नहीं
टूटे रिश्ते संभाल जाते हैं पर रहते वो जज़्बात नहीं
इल्ज़ाम ये था की मेरा काम देता कोई अंजाम नहीं
टूटी उँगली टूटे जज़्बात आ सके कुछ काम नहीं
बहुत समय हुआ दोस्तों से रूठा भी नहीं
शायद पता था की अब मनाएगा नहीं कोई
बहुत समय हुआ माँ क़सम खाई भी नहीं
शायद पता था सच्चा समझा जाऊँगा नहीं
बहुत समय हुआ दिल लगाया ही नहीं
शायद पता था ये दिल अब जख्म उठा पायेगा नहीं
बहुत समय हुआ कंधे पे रख सिर रोया भी नहीं
शायद पता था शमशान ले जाने वाले कंधे सहारा देते नहीं
बहुत समय हुआ आंसू वाली हँसी, हँसी भी नहीं
शायद पता था आंसुओं की कहानी पढ़ पाएगा नहीं कोई
वो उतरता है ख़ुद उसे उतार अपनी कलम में सकते नहीं
वो मौजूद है हर वक्त हर जगह पर दीदार कर सकते नहीं
एक उम्र निकल दी उसको समझने में ख़ुद को समझने में
अब ना ज़्यादा उम्र बची है ना ज़्यादा समझ
कुछ करते रहना, कुछ होते रहना ही कोई ज़िन्दगी नहीं
ज़िंदगी तो मस्ती से जी रहे हैं वो, जो ना करते है, ना कुछ होते है
कब उसकी ज़िंदगी की भीड़ में शामिल हो गए हम
पता ना चला, कब ख़ास से आम हो गए हम
कब, नज़रों से गिर गए थे उसकी, हम कुछ इस तरह
की फिर उठ ना पाये , बदनाम हुए सरेआम हम
क्यों हर कोई खास बनने को बैचैन है
वो खुदा रहता सबमें सबको आम बनाने को
ना ज़िद से पाया ना हदों में रहके पाया
उस खुदा को मैंने उस खुदा का होकर पाया
ए माँ तेरी छाँव में
हम बच्चे ही रह गये
जमाने ने पकड़ाया हमें झूठ का दामन
पर हम जमाने में अकेले और सच्चे ही रह गए
ए माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए
समझदारों की भीड़ में खो दिया अपने आपको
फिर भी ना जाने क्यूँ हम कच्चे ही रह गए
ए माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए
सही ग़लत का तालाब मेरा ख़ाली और सूखा था
उन ग़लतियों के तालाब को हम भरे चले गए
ए माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए
अहसानो से ज़्यादा अहसासों पर ज़ोर था
पर नादानियों के बोझ तले हम दबते रह गये
ए माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए
दिल की मिलकियत जब कर गयी फ़तह दिमाग़ी बाज़ियों को
ए दिल ए आशिक़ हम सब सितम सह गए
ए माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए
जिसके दीदार को तरसती थी आँखें
वो ढूँढते थे आंसू और हम हँसते ही रह गए
ए माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए
अब बदल गए वो जिन्होंने बदली थी मेरी दुनिया
सितम ग़र आशिक़ कुछ ना कहकर भी सब कुछ कह गये
ए माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए
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