एक कप चाय बना दो
अच्छा गया, बुरा गया
बीता पल दिन में फिर समा गया
रात बैठा, मैं जब अपनों के साथ
तो तलब लगी और माँग लिया
अरे कोई एक कप चाय बना दो
बहुत रो रहा एक गली-मुहल्ला
वहाँ लोगों का बाज़ार लगा
शायद कहीं कोई गुज़र गया
अफ़सोस जताने हर कोई आ रहा
अरे कोई एक कप चाय बना दो
सैर सुबह की करने मैं चला
सामने मेरा दोस्त मिला
सैर सपाटा छोड़ वहीं पर
घर चल, बातों का सिलसिला चला
अरे कोई एक कप चाय बना दो
कर बुराई, कर लड़ाई
जब मन का भार कुछ हल्का हुआ
माँग ली अपनों से माफ़ी
माफ कर गैरों का अपना हुआ
अरे कोई एक कप चाय बना दो
देश से अपने दूर हो गया
कॉफ़ी पीना जब दस्तूर हो गया
छोड़ के सारी शर्मोहया
दफ़्तर में एक दिन ऐलान किया
अरे कोई एक कप चाय बना दो
मौसम के रंग होते कितने
पर अच्छी चाय का एक रंग होता
बारिश में पकौड़े के साथ
काँपते होंठ बोले एक सर्दी की रात
अरे कोई एक कप चाय बना दो