में हूँ
क्या ये काफी नहीं है
क्या तुमने पेड़ों को इतराते देखा है
लदे भरे फूलों की डाली जिनपे
क्या तुमने गिलहरी को करहाते देखा है
अखरोट उठाए घूमती दिनभर
क्या तुमने नदी को इठलाते देखा है
समंदर से मिलते एक प्रेमी की तरह
क्या तुमने आसमान को गुमान करते देखा है
सारी धरा है अधीन उसके
क्या तुमने सागर को सिमटते देखा है
समा के सारा संसार वो खुद में
क्या तुमने चिड़िया को छिपाते देखा है
विचरती खुले आसमान में दिनभर
क्यूँ तुम हर दिन इतराते, कहराते, इठलाते, गुमान करते, सिमटते, छिपाते दिखाते हो
में हूँ
क्या यह काफी नहीं है
Aarushi Agrawal