Wednesday, July 31, 2024

hindi long poems

 तुम भरी भरी बूँद बारिश की

मैं सूखी तपती ज़मीन ख्वाहिशों की

तुम ऊंचे शिखर वाला पर्वत अकेला
मैं रात में खिलने वाली कोमल बेला

तुम सागर में आयी ऊँची ऊँची लहरे बेहिसाब
मैं झील का सिकुड़ा शांत पानी हूँ जनाब

तुम देवों के देव महादेव के अनुयायी
मैं जनमी हूँ बर्फ़ानी बाबा बनके तेरी परछाईं

में हूँ 

क्या ये काफी नहीं है 


क्या तुमने पेड़ों को इतराते देखा है

लदे भरे फूलों की डाली जिनपे


क्या तुमने गिलहरी को करहाते देखा है 

अखरोट उठाए घूमती दिनभर


क्या तुमने नदी को इठलाते देखा है 

समंदर से मिलते एक प्रेमी की तरह 


क्या तुमने आसमान को गुमान करते देखा है 

सारी धरा है अधीन उसके 


क्या तुमने सागर को सिमटते देखा है 

समा के सारा संसार वो खुद में 


क्या तुमने चिड़िया को छिपाते देखा है 

विचरती खुले आसमान में दिनभर


क्यूँ तुम हर दिन इतरातेकहरातेइठलातेगुमान करतेसिमटतेछिपाते दिखाते हो


में हूँ 

क्या यह काफी नहीं है 


तू ख़्याल तो नहीं 


चमकते तारो सा दूर दूर तू रहता है -

छूने की चाह में मेने खुद को जलाया है कई बार 

तू कहीं मेरा कोई ख़्याल तो नहीं 


चाहा था तुझे बड़ी शिद्दत से पाना -

खुदा समझ ना पाया और खुद उतर आया 

तू कहीं ………


क़रीब इतने ना थेकभी हम अपने आपसे-

तूने मुझसे मुझे मिलवाया

तू कहीं…..,,,,,


हसरतें बहती मेरी आवारा नदी जैसे-

मुझे मेरे सागर से जा मिलाया 

तू कहीं ….,….


मेरे बेचैनियों के बवंडर में गोते तूने कितने खाए- 

मेरी डूबती कश्ती को किनारे लगाया 

तू कहीं ……….,


ये रूहों के रिश्तोंको समझ नहीं पाई मेरी चंचल जवानी -

मुहब्बत से इश्क़ का सफ़र तय तूने कराया 

तू कहीं …….



साधना 

सूफ़ियों का नाच

लता की आवाज़

कामवसना का वो आख़िरी चरण

फूलों की सुगंध और 

मिष्टान्नों का स्वाद


ये सब साधना तुल्य हैं  

जहाँ बाहर की आँखें बंद और अंतर्मन की आँखे खुल जाती है


वो 


फूलों की ख़ुशबू है बिखरी

पर माली नहीं दिखता.

पक्षियों का मधुर संगीत है

पर संगीतज्ञ नहीं दिखता.

तस्वीर सी ये ज़मीनरंगो से भरा ये आसमान 

पर इसका चित्रकार नहीं दिखता .


वो करता है सब कुछ पर दावा नहीं करता 

वो गुमशुदा नहीं हैउसे ढूँढा ज़ाया नहीं सकता 

मालिक अलाह खुदा  भगवान 

वो चाहता मुझे बेपनाह पर जताया नहीं करता 


 माँ तेरी छाँव में

हम बच्चे ही रह गये


जमाने ने पकड़ाया हमें झूठ का दामन

पर हम जमाने में अकेले और सच्चे ही रह गए 


  माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए 


समझदारों की भीड़ में खो दिया अपने आपको 

फिर भी ना जाने क्यूँ हम कच्चे ही रह गए 


 माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए 


सही ग़लत का तालाब मेरा ख़ाली और सूखा था 

उन ग़लतियों के तालाब को हम भरे चले गए


 माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए 


अहसानो से ज़्यादा अहसासों पर ज़ोर था

पर नादानियों के बोझ तले हम दबते रह गये


 माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए 


दिल की मिलकियत जब कर गयी फ़तह दिमाग़ी बाज़ियों को 

 दिल  आशिक़ हम सब सितम सह गए 


 माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए 


जिसके दीदार को तरसती थी आँखें 

वो ढूँढते थे आंसू और हम हँसते ही रह गए


 माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए 


अब बदल गए वो जिन्होंने बदली थी मेरी दुनिया

सितम ग़र आशिक़ ना कहकर भी सब कुछ कह गये


 माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए 


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