तुम भरी भरी बूँद बारिश की
में हूँ
क्या ये काफी नहीं है
क्या तुमने पेड़ों को इतराते देखा है
लदे भरे फूलों की डाली जिनपे
क्या तुमने गिलहरी को करहाते देखा है
अखरोट उठाए घूमती दिनभर
क्या तुमने नदी को इठलाते देखा है
समंदर से मिलते एक प्रेमी की तरह
क्या तुमने आसमान को गुमान करते देखा है
सारी धरा है अधीन उसके
क्या तुमने सागर को सिमटते देखा है
समा के सारा संसार वो खुद में
क्या तुमने चिड़िया को छिपाते देखा है
विचरती खुले आसमान में दिनभर
क्यूँ तुम हर दिन इतराते, कहराते, इठलाते, गुमान करते, सिमटते, छिपाते दिखाते हो
में हूँ
क्या यह काफी नहीं है
तू ख़्याल तो नहीं
चमकते तारो सा दूर दूर तू रहता है -२
छूने की चाह में मेने खुद को जलाया है कई बार
तू कहीं मेरा कोई ख़्याल तो नहीं
चाहा था तुझे बड़ी शिद्दत से पाना -२
खुदा समझ ना पाया और खुद उतर आया
तू कहीं ………
क़रीब इतने ना थे, कभी हम अपने आपसे-२
तूने मुझसे मुझे मिलवाया
तू कहीं…..,,,,,
हसरतें बहती मेरी आवारा नदी जैसे-२
मुझे मेरे सागर से जा मिलाया
तू कहीं ….,….
मेरे बेचैनियों के बवंडर में गोते तूने कितने खाए-२
मेरी डूबती कश्ती को किनारे लगाया
तू कहीं ……….,
ये रूहों के रिश्तोंको समझ नहीं पाई मेरी चंचल जवानी -२
मुहब्बत से इश्क़ का सफ़र तय तूने कराया
तू कहीं …….
साधना
सूफ़ियों का नाच
लता की आवाज़
कामवसना का वो आख़िरी चरण
फूलों की सुगंध और
मिष्टान्नों का स्वाद
ये सब साधना तुल्य हैं
जहाँ बाहर की आँखें बंद और अंतर्मन की आँखे खुल जाती है
वो
फूलों की ख़ुशबू है बिखरी
पर माली नहीं दिखता.
पक्षियों का मधुर संगीत है
पर संगीतज्ञ नहीं दिखता.
तस्वीर सी ये ज़मीन, रंगो से भरा ये आसमान
पर इसका चित्रकार नहीं दिखता .
वो करता है सब कुछ पर दावा नहीं करता
वो गुमशुदा नहीं है, उसे ढूँढा ज़ाया नहीं सकता
मालिक अलाह खुदा ए भगवान
वो चाहता मुझे बेपनाह पर जताया नहीं करता
ए माँ तेरी छाँव में
हम बच्चे ही रह गये
जमाने ने पकड़ाया हमें झूठ का दामन
पर हम जमाने में अकेले और सच्चे ही रह गए
ए माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए
समझदारों की भीड़ में खो दिया अपने आपको
फिर भी ना जाने क्यूँ हम कच्चे ही रह गए
ए माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए
सही ग़लत का तालाब मेरा ख़ाली और सूखा था
उन ग़लतियों के तालाब को हम भरे चले गए
ए माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए
अहसानो से ज़्यादा अहसासों पर ज़ोर था
पर नादानियों के बोझ तले हम दबते रह गये
ए माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए
दिल की मिलकियत जब कर गयी फ़तह दिमाग़ी बाज़ियों को
ए दिल ए आशिक़ हम सब सितम सह गए
ए माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए
जिसके दीदार को तरसती थी आँखें
वो ढूँढते थे आंसू और हम हँसते ही रह गए
ए माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए
अब बदल गए वो जिन्होंने बदली थी मेरी दुनिया
सितम ग़र आशिक़ ना कहकर भी सब कुछ कह गये
ए माँ तेरी छाँव में हम बच्चे ही रह गए
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