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भोगो भाग
वो बातें खुद-से, वो अनदेखे ख़्वाब
पेश करती हूँ इस महफ़िल में, मैं खुद को जनाब
तुम कोशिश न करना समझने की मुझको
बस पढ़ लेना, मेरी ज़िन्दगी की किताब
सबसे पहले, मैं उन सभी पाठकों का आभार व्यक्त करती हूँ, जिन्होंने मेरी कविताओं को पढ़ा, सराहा और मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
मेरे परिवार, जिन्होंने हर कदम पर मेरा साथ दिया और मेरे सपनों को साकार करने के लिए हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया, उनका मैं तहे दिल से धन्यवाद करती हूँ।
मेरे मित्र, जिन्होंने मेरी हर कविता पर ईमानदार सुझाव दिए और मेरे लेखन को निखारने में मदद की, उनके प्रति मैं बेहद कृतज्ञ हूँ।
उन गुरुओं और साहित्य प्रेमियों का भी आभार, जिन्होंने मुझे शब्दों की ताकत और कविताओं की गहराई समझाई।
अंततः, मैं उन अनदेखे पलों और भावनाओं का धन्यवाद करती हूँ, जिन्होंने मुझे शब्दों के इस जादू से जोड़ दिया।
यह पुस्तक आप सभी के सहयोग और विश्वास की प्रतीक है। आपके बिना यह सफर अधूरा होता।
देखो उस पेड़ को कितना शर्माया हुआ है
वो कहते हैं ज़िंदगी किताबों से नहीं चलती
जनाब इत्मीनान से एक पन्ना पलट के तो देखिये
भागेगी ये ज़िन्दगी
ज़रा हवा चलने से
कभी फूल पौधे से जुदा हुआ है
वो तो आँधी आयी थी उस दिन
उन्हें अलग करने को
मैं खुश महसूस बहुत करता
जब "आज" के संग में रहता
"कल" जब भी मुझसे मिलने आता है
बहुत सताता , बैचैन कर जाता है
जब दूर था अपने से तो पास तुझे बुलाता था
जब दूर था अपने से तो पास तुझे बुलाता था
अब पास हूँ अपने इतने की दूरी तुझसे लगती नहीं
मंजिल या मुकाम से अच्छा
सफर भी हो सकता है।
जहाँ हमसफ़र तू अपना बन जाए
तो न मंज़िल की परवाह, न सफर का होश
मशगूल हैं वो तीन दोस्त बातों में अपनी - २
इतना लम्बा रास्ता तय भी हो गया
मंज़िल भी आ गयी
और वापिस भी लौट चले
पर कुछ पता न चला
अकेले ज़िन्दगी का मज़ा लीजिये -२
ये ज़िन्दगी है कोई अर्थी नहीं
जहाँ चार कदम चलने के लिए
चार कंधो का सहारा चाहिए
नखरों के भी अपने नखरे होते है जनाब
नखरों के भी अपने नखरे होते है जनाब।
मुहब्बत बेपनाह उनसे जब हुई-
तो मेरे नखरे को ठुकरा दिया उनके नखरों ने
ये कह कर की बड़े नखरे हैं आपके।
शिकायतों का काफिला कुछ ऐसे निकला
छोड़ गया पीछे एक मुहब्बत की दास्ताँ
क्या करूँ मैं भी इंसान हूँ
सबके साथ बिताया अच्छा वक़्त याद करती हूँ
वक़्त पलट के आता नहीं वपिस
ऐसा अहसास है मुझे !
इसलिए शायद सबको और खुद को
फिर एक बार माफ़ करती हूँ.
रंग बदलते देखा है मैंने
मौसम में पत्तो को और रिश्तो में अपनों को
ये ज़िन्दगी क्यों इतना सीखा रही है
ये ज़िन्दगी है या कोई स्कूल का इम्तिहान
यहाँ जितने चेहरे, उतने प्रश्न
प्रश्न अलग हैं , सबके सबक अलग हैं
पर अंत है सबका , एक समान
फिर ये ज़िन्दगी क्यूँ इतना सीखा रही है
ये ज़िन्दगी है या कोई स्कूल का इम्तिहान
वो पेड़ जो है मेरे आँगन में
बहुत जलता हूँ मैं उससे।
कितने मौसम आये
कितने मौसम गए
वो पेड़ खड़ा रहा डटकर।
यहाँ तो हर शब्द एक तूफ़ान सा
डगमगा देता मुझको हर मौसम में।
तीर कमान से और शब्द जुबान सेएक बार ही निकलते हैं।
काटते हैं दोनों, एक बाहर से और एक अंदर से।
पर अगर कामदेव का तीर हो और शब्दों में पीर फ़कीर हो
तो प्रेम की धारा बहती अपरम्पार है
ये ज़िन्दगी मेरी, तेरी उलझी ज़ुल्फ़ों की तरह
ये ज़िन्दगी मेरी, तेरी उलझी ज़ुल्फ़ों की तरह
सुलझाऊँ तो टूटने का डर
और छोड़ दूँ अगर खुला इन्हे
तो और उलझने का डर
तूफ़ान से तेज उसकी जुबान
एक बार फिर हमारे रिश्ते की कश्ती डुबो देती
वो तो किनारा मिल गया
उस खुदा का सहारा मिल गया
वो पत्नी ढूँढती पति में सहारा
वो पति का सहारा पत्नी में।
वो बच्चे का सहारा माँ बाप है
माँ बाप ढूँढे भगवान में।
वो इंसान सहारे जब भगवान चला
भगवान सहारे इंसान चला।
ना कोई रुका , ना कोई झुका
हर इंसान में जब भगवान् दिखा।
उस दिन वो खुद में ख़ुदा हो गया
सब सहारों से बेपरवाह और जुदा हो गया।
बात उसूलों की थी वरना रिश्तों की परवाह वो भी करते थे
एक ज़माना था जब उसूलों से ज़्यादा वो हम पे मारते थे
LP
वो उगता सूरज याद दिला गया
उस नवजात शिशु की
जिसे प्यार मिलता सारे जहां का
देखने आते सब गली मोहल्ले के लोग
सूरज सा चमकता उसका कोमल चेहरा
वो दिन का सूरज समझा गया
अब प्यार कहीं नहीं पर पड़ती गाली है
सारा दिन बस चमकता रहता,
गर्मी से अपनी सता रखा
जा कहीं, कुछ तुझको काम नहीं है
वो ढलता सूरज दिखा गया
जब शाम ढलेगी ज़िंदगी की
एक बार फिर अपनों का प्यार मिलेगा
वो पहले वाला दुलार मिलेगा
फिर आयेंगे लोग देखने को
सूरज सा चमकता तजुर्बों भरा चेहरा
उसकी सूखी ख्वाहिशें उस सूखी ज़मीन की तरह थे
जहाँ घनघोर बारिश भी हो तो
भाप बनकर उड़ जाती
पूरा करने को सब ख्वाहिशें उस खुदा को सैलाब लाना ही पड़ा
LP
ख़ुद को बिखरने देना नहीं किसी हालात में
लोग गिरते मकान की ईंटे तक उठा लेते हैं
जो आंसू तेरे निकले
तो उन मोतियों के वो हार बना लेंगे
जो चीखे या चिल्लाए
तो उन आवाज़ों से मल्हार वो रचा लेंगे
जो ख़ुद को करा घायल
तो उस लाल रंग कर शृंगार, खुद को सवांरेंगे
ख़ुद को बिखरने देना नहीं किसी हालात में
लोग गिरते मकान की ईंटे तक उठा लेते हैं
हर आशिक़ में एक शायर और एक शायर में आशिक़ छिपा होता है
मिलना तभी होता है जब उसका महबूब जुदा होता है
शराब
कमाल करती है शराब
ना समय का होश उसे
ना परवाह जगह की वो करती है
जब चढ़ती है मुझ पर तब क़यामत ही क़यामत बरसती है
कमाल करती है शराब
बोतल में रहती ख़ामोश
पैमानों में छलका करती है
जो लग जाये होटों से जिसके, उसे बे-आबरू सरेआम करती है
कमाल करती है शराब
जब महफ़िलों में पी ली जाती
तब ही कातिल अदायें उतरती है
तन्हाइयों में वो आँसूओं से मेरा जाम, साकी बन भरती है
तोहमतें बहुत लगी जब होश में वो आ गया
यहाँ इज़्ज़त बहुत देते हैं लोग पीने के बाद
दो आँखें जो देखती थी हमे दिन रात
कहीं दूर बहुत वो चली गई
अनपढ़ थी पर पढ़ लेती जज़्बातों की किताब
कहीं दूर बहुत वो चली गई
चाहने से नहीं मिलता, ख़ुदा देता वही जो लगता उसे ज़रूरी है
चाहे रास्ते कितने भी बदल ले मुसाफ़िर, मंज़िल से लगती हमेशा एक दूरी है
कल तक जो लगती गलती थी , आज कल वो social trend है
5-6 boyfriends, one night stand, LGBT experience ना हो, तो लगते आप obsolete हो गयी कोई brand हैं
मियाँ बीवी जबसे working couples हुए, चल दिए फिर अपने अपने रस्ते
parents old age homes में, और बच्चे day care center में ही हसते और बसते
आटा अब पिसवाता कौन, गरमागरम रोटी खिलाता कौन
Rotimatic ही सबकी माँ हो गया , वो ही सबका बाप हो गया
अब परिवार के लोगों से ज़्यादा,
वहाँ आवाज़ माँ की पहुंचे न पहुंचे पर data के bytes बिना कुछ कहे पहुँच गए
ऊंची नीची कटी फटी jeans वाली नारी, hot babe कहलाती हैं
दुपट्टे की बस बातें ही अब, मुझे मेरी बेबे की याद दिलाती हैं
wait lunch dinner पे अब , किसका कौन करता है
ubereats का नाम तुम जप लो, पेट सबका वो ही भरता है
family vacation अब भैया, facebook के नाम हो गयी
Tiktok निहारते देखो तुमको, कैसे सुबह से शाम हो गयी
मंगलवार को मंदिर दर्शन और रविवार को रामायण देखा करते
पढ़े लिखे हुए जबसे हम, राम नहीं अब, insta, reels दुःख हैं हरते
वो शाम को खेलना दोस्तों के साथ, complete fitness हो जाती
अब कर लो club, kitty, gym, yoga, क्यों रात को नींद नहीं आती
वो भी एक जमाना था जब उड़ती लहराती ज़ुल्फ़ें औरत की character पे सवाल उठाती
अब कटा के ज़ुल्फ़ें, मादा बनी मर्द, women empowerment का बवाल है मचाती
जितने complicated mind हुए, उतने धागे relations के उलझे
एक mom पर चार पिताजी, कौन सा मेरा, ये mystery कैसे सुलझे
जो बदले ना तुम साथ समय के साथ तो rat race हार जाओगे
जो हार गए तो जीते बाजी, अब nirvana का धन तुम पाओगे
जीवन मेरा फूलों की डाली सा
भर गया, लद गया , झुक गया
वो चंचल बहता नीर, शांत सरोवर में जाकर, कहीं रुक गया
रुका तो पाया, खोने को कुछ नहीं इस जहान में
जब पाया उसने , तो जाने कहाँ दुख गया, सुख गया
शायद ज़ख्मो से भरा नहीं दिल उनका-२ , कि हर एक ज़ख़्म पे अपने, वो वाह वाह करते है
कोई जाए और समझाए उन्हें, दर्द में उनके, हम किस तरह आहें भरा करते हैं
एक चाक पे घूमता मेरा जीवन
उस कुम्हार की मटकी सा बनता ये जीवन
थापे पड़ती रही हर ओर से
पर तेरे नाम ने अंदर हमें सम्भाले रखा
मन जब तन से भर जाएगो , तब चक्षु सब खुल जावेंगे
खेल
अच्छा हो गया, बुरा हो गया
जो होना था, वही हो गया
ना मैं रचता, ना निर्माता
बस खेल खेल में खेलता जाता
कभी जीतता , मैं जो जाता
तो बन के राम पूजा जाता
हार जब जाता इस खेल जगत का
तो दस सिर का रावण कहलाता
माया रूपी जग मिला, तो कैसे मिलें प्रभु श्री राम
प्रभु कृपा जब होएगी तो, छू ना पावें विषय और काम
माया रूपी जग मिला, तो कैसे मिलें नन्दलाल
जो कृष्णमंत्र का जाप करे, वो सदा रहें मालामाल
अच्छी बातें
तुझसे मिलने पे कुछ अच्छी बातें हुई
ये दिल रूठा
अपने होने का भ्रम टूटा । बहुत कुछ छूटा
विश्वास का पात्र ऐसा टूटा
लगता अब सब झाँसा और झूठा
माया का संसार जिसने मेरा लूटा
वो प्रभु मिला गया, तो अब कौन है रूठा
LP
कोई ढूँढे पथर में
कोई मांस मज़्ज़ा में
कोई चीर आसमान का सीना
घुस गया कोई पताल में
कोई उल्टा लटके घंटो
कोई झुका नमाज़ में
आंख मूँद, कोई घंटी बजाये
कोई सुनता अजान की आवाज़ में
सब ढूँढ रहे पर पता नहीं
कहाँ राम छिपा, ना रहीम दिखा
जो बैठ गये थक हार के हम
तो तुझमे मुझमे वो एक ही दिखा
मेरे प्रभु से गलती हो नहीं सकती
जो मन मुताबिक़, वो तन को भाया
जब दुख आया तो, मन घबराया
बंद आँख से, लगे जग अपना
जो आँख खुली तो, सब प्रभु की माया
मेरे प्रभु से गलती हो नहीं सकती
अनुभव की जब किताब भरी तो
आरती संग्रह भी काम ना आया
कर्मों की जब आँधी उड़ी तो
आस्था का, ध्वज रज में लहराया
मेरे प्रभु से गलती हो नहीं सकती
सच जानने के लिए कुछ दूरी ज़रूरी है
सच्ची मुहब्बत, होती ख़ामोशी से पूरी है
भेद
हँसता मुझ पे, तू संसारी, हंस ले खुद पे तो उद्धार हुआ
ढूंढता क्या तू इधर- उधर, तू झाँक अंदर और पार हुआ
क्या जोड़ता अम्बार संबंधों के , तू तोड़ के रिश्ते कर्म मुक्त हुआ
भोग विलास में निकला जीवन , भरा हुआ मन अब रिक्त हुआ
भावे दुनिया के पड़पंच जहाँ पे , रंगमंच का किरदार ,मैं विरक्त हुआ
करो कुछ ऐसे, जैसे तुमने कुछ किया नहीं
भोगो ऐसे जैसे तुम्हे कभी कुछ मिला नहीं
त्यागो ऐसे जैसे कभी जरूरत नहीं
आज (present)जो है वो कल (yesterday) बन जाएगा
कल(future) तो क़ादिर कल (tomorrow) ही आएगा
जियो ऐसे की कोई कल (past or future) नहीं है
जो मरोगे पल में, कल कहीं नहीं है
गाड़ियाँ बहुत थी
खड़ी उस सड़क पर
ना कोई हलचल ना कोई आवाज़
कैसा वीराना, सन्नाटा
इस मेरे मन में
ना मौत की दस्तख, ना ज़िन्दगी की आ
ध्यान अपना राखिये, तो रख सकें दू
मान सबका राखिए, तो बढ़े आपको मा
जीवन ऐसा मैं जियूँ ,जो आये दू
अगली यात्रा को निकल पड़ूँ, पर पीछे र
नई दुल्हन-सा वो पेड़
पतझड़ में विधवा हो गया था
लगता था जैसे कहीं यौवन उसका खो गया था
नहीं- नहीं, वो तो बसंत की तैयारी कर र
पास गया,पाया, कुछ कोपिले फूटती थीं उसपे
वो फिर से जवानी की हवाओं पे सवारी कर रहा था
उसकी खामोश नज़रों का कोई क़सूर नहीं -२
शायद मेरी मुहब्बत में अब वो सुरूर नहीं
लगता है मेरे मुक़द्दर में बस इतना ही इश्क़ लिखा था-२
खुदा मिला तुझमे जब अपना , लगता कोई अब साहिब-ए-सुरूर नहीं
वो पौधा मेरे बग़ल में ही था
और मुझे पता भी ना चला
पर जब हाथ पड़ा मेरा उसपर और वो
मैं उसे आज तक भूल ना पाया
सारी उम्र निकल दी
इस होश को साधने में -२
पर जब सधा मेरा ये होश
तो बहुत देर हो चुकी थी
नई ज़िंदगी की बिगुल बज चुकी थी
बहुत देर हो चुकी थी
बीज
वो बीज ज़मीन के अंधेरे में
नरमी में गर्मी में
सिकुड़ा, घबराया, शर्माया सा बी
आँधी,बारिश, पेरों की थापो से कँ
जब जागा एक लंबी नींद से वो
वो पौधा बनकर जब उठा
वो बीज अब कहीं नहीं था
वो पलों की तरह कहीं खो गया
वो उस पौधे में बीज बन फिर सो गया
बातों और बीती यादों की परतों में दबा-दबा सा जीवन
क्या सच है या एक सपना
खोजता हूँ ख़ुद को इन परतों में,
लगूं मैं कभी पराया और कभी अपना
कितने sunrise and sunset दिखाए तुमने
रिमझिम बूँदों में चाय मग्गी खि
हाथ पकड़ कभी पहाड़ चढ़ा दिया
तैरती मछ
समझदारी ने तेरी, छोड़ा नहीं मेरे बचपने का साथ
ग़ुस्सा जो मैं हो जाऊं, तो खिलाया खाना अपने हाथ
ज़िन्दगी के हर रंग से परिचय करवा दिया
तुमने मुझ को मुझसे मिलवा दिया
शिद्दत से भरा मेहबूब मिले, ये बस किस्मत की बात है
ज़िद्द और ज़ज़्बात से भरा, तू उस कुदरत की करामात है
मैं मिलता जुलता लोगों से
मैं ख़ुद से मिलता कभी नहीं
अपने से मिलने को रोज़ रोज़
कितना शोर शराबा चाहिए मुझे भई
मैं चाहता पैसा गाड़ी और मकान
मन फिर भी मेरा भरता नहीं
फटी हुई है झोली मेरी
मैं भिखारी बस इस एक जनम का नहीं
मैं होता खुश, मैं होता खुश , तो लोगों का साथ
रोता तो कोई पास आता नहीं
सबकी अपनी राहें , सबकी अपनी मंज़ि
सबकी अपनी राहें , सबकी अपनी मंज़ि
कडु सच है दोस्तों
पर अंत समय में साथ कोई निभा सकता न
उस तूफ़ान के बाद ताज़गी को महसूस किया मेने
जब सूरज ऊगा था, सिर उठा के
बदचलन बादल हट गए घबरा के
जब किरणों ने चूमा खिलखिला के
नयी नवेली कोपलों को
जो शर्मा के बैठी इंतज़ार में
उस तूफानी बारात के विदा होने का
खा लिया पी लिया भोग लिया
और में भी गई कितनी बदल
वक़्त बदला
वक़्त की चाल बदली
ख़ाली झोली लेके मैं अपने महबूब
और वो तो दर-बदर का भिखारी नि
पर जो कुछ था उसकी झोली में,
सब
रब से बड़ा मेरे महबूब का जिगरा
उसकी बातों ने मेरे महसूस को चू
जैसे उनका निकाह हो गया
और में चुप हो गया
जज़्बातों ने मेरी, उसके आँसुओं
जैसे कोई दोस्ताना हो गया
और में चुप हो गया
मेरी ख़ूबसूरती को तराशतीं उसकी
उस कारीगर पे दिल बेमिसाल हो गया
और में चुप हो गया
काला धागा , अग्नि, मंत्र कर सक
पर उन्हें ताउम्र निभाने को चा
जहां धागों में दुख-सुख के मनके
जहां अग्नि पावन प्रेम की धधकती
जहां एहसासों का मंत्रोच्चरण सु
वो रिश्ते पाक-परवरदिगार हो जा
वो घर काबा बन जाते हैं
ज़रा हवा चलने से
कभी फूल पौधे से जुदा हुआ है
वो तो आँधी आयी थी उस दिन
उन्हें अलग करने को
मेरे प्रभु मेरे राधे श्याम
लिखता कविता, गाता उसके गान
करता पूजा अर्चना, रख दिये कितने
मेरे प्रभु मेरे राधे श्याम
ढूँढने चल देता, उसे सुबह और शाम
खींचता तस्वीरे ,कभी फूलों की कभी पत्थर की
मेरे प्रभु मेरे राधे श्याम
उठता ब्रह्म मुहूर्त, रोज़ करता
जोड़ता उससे बंधन ,करता शरीर की
मेरे प्रभु मेरे राधे श्याम
खाता,बोलता, हस्ता, रोता सुबह से शाम
ढूँढता ज़रिए, समाने के उस असीम
मेरे प्रभु मेरे राधे श्याम
करता भेंट हर कर्म मैं अपना, उस
कर्म ,बुद्धि, भक्ति से चाहा पाना,
मेरे प्रभु मेरे राधे श्याम
छिपा हुआ तू कहीं नहीं , जो ढूँ
बस मैं तुझमें, तू मुझमें, बहते
मेरे प्रभु मेरे राधे श्याम
कैमरे की रील पे उतार लो कितना
ये बदलते बदलों सी ज़िंदगी है
ना कुछ रोक पाओगे
ना फिर वो वक़्त वापिस ला पाओगे
जब तजुर्बों के पन्ने भरने लगे
वो आँधी आयी थी उस दिन,
खुल गई
जिसके हाथ जो पन्ना लगा
कोई दोस्त , कोई दुश्मन बन गया
किसी ने की घृणा, कोई दया कर गया
और उस दिन मेरी किताब में एक प
छिपा दूँगा किताब
जला दूँगा किताब
पर ना खुलने दूँगा जनाब
ये किताब नहीं है
ये तो जज़्बातों की स्याही से लि
मैं मिला उससे जब पहली बार
वो कोई ख़ास दिल के बहुत पास
बस समझ नहीं आया
"मैं" वो हूँ जो है ख़ास
या फिर जो मिला मुझसे पहली बार
जब आयी ज्ञान की आँधी
तो ना ज्ञानी बचा, ना बचा उसका ज्ञा
उड़ा ले गई अपने संग वो
काम, क्रोध, इच्छा, अभिमान
हवा से खुलता बंद होता वो बग़ल
अट्टहास करता
मेरी उन २ बेज़ु
जो गड गई थी उस पे कीलें बनके
कोयल की कूक सा -sweet
गूँगे की मूक सा -silent
नयी दुल्हन की भूलचुक सा - simple n innocent
तेरा प्यार सदा रहा बरसता, मु
पर वहाँ ना पानी था ना बादल थे
ना शिव, ना बुध, ना महावीर है बनना
ना बनना राम, कृष्ण, हनुमान
बस सीख लूँ जीवन से इनके -२
त्यागूँ मैं या त्यागे मुझे धन, वैभव, अभिमान
यह जीवन एक लीला है
दुनिया एक रंग मंच,
जहाँ चल रहा ना
किरदार निभा जब विदा मैं लूँ तो
यार -ए -गार ज़रा गौर फरमा तू
देख रूमाल तेरा भी
चला बहुत मैं, मैं बहुत चला
फिर ठोकर लगी और मैं गिर भी गया
फिर उठा संभल के, फिर चलने को
फिर ठोकर और फिर से गिरने को
मुझे मिले राह में मुसाफ़िर कितने
ज़िंदगी ने मिलाया, फिर सपना बना
लेकर सबकी यादों को चला
चला बहुत मैं, मैं बहुत चला
चोट खायी और लड़खड़ाया मैं
कभी प्यास जगी, कभी भूख लगी
कोई दवा दे गया, कोई दे गया दारू
जिस्मों के बाज़ार से,
कादिर, मैं निकला कुछ
ना ख़ुद रुका ना ये जिस्म रुका
चला बहुत मैं, मैं बहुत चला
जहाँ प्रेम हो , पर इज़हार नहीं
जहाँ ख़ूबसूरती हो, पर आइना नहीं
वफ़ा की चादर में लिपटे हुए हम तुम
जहाँ तनहाइयाँ हो, पर बेवफाई नहीं
जहाँ शर्मो हया हो, पर कोई पर्दा नहीं
जहाँ प्यास हो जन्मो की, पर जिस्म की चाह नहीं
उस दीदार के लिए तरसते हुए हम तुम
जहाँ इंतज़ार हो , पर वक़्त का कुछ पता नहीं
आज फिर से कोशिश थी, ख़ुद से ही मि
पर ख़ुशबूदार गुलाबों और चुभते
यादों और बातों की बगिया से नि
आज फिर ख़ुद ही खुद से मैं मिल ना सका
खबर दी तुमको ये किसने मेरी-2
हम तो, ख़ुद से खुद ही बेखबर इतने
काश अब होश में आ जाएँ हम- तुम
ना हम-तुम रहेंगे न खबरें रहेंगी
मैं तो बस एक रिक्त स्थान हूँ
जो भर रहा हूँ , हर रोज़ ,हर वक़्
शब्दों से, वाक्यों से ,
और कुछ दिलचस्प कहानियों से
अनजानों की लम्हे जैसी बातों से
रिश्तों और परिचितों के वाद वि
भर रहा तिजोरी कुछ बेशक़ीमती पत्थ
और कर दी दीवाल बोझिल ओहदों की
दो साँसों के बीच बची थी
उस जगह , जगत कुछ भरने लगा
मान मर्यादा के मनके पिरोये , संस्कारों की लम्बी माला में
सबने मिल अभिमान भरा, भरा चाहतों का घड़ा बड़ा
बड़ा घड़ा जब टूट गया, तो शुरू से मैं फिर शुरू हुआ
अब कहता मैं सन्यासी हूँ ,
फिर घड़ा धर्म का ले आया
क्या जीवन मेरा सिर्फ भरने को हुआ
में तो बस एक रिक्त स्थान हूँ
जो भर रहा हूँ, हर रोज़, हर वक़्
मान की चाह रखने वाले
अपमान दबे पाँव आता होगा
सफलता की चाह रखने वाले
विफलता का झंडा फहराता ही होगा
प्रेम की चाह रखने वाले
घृणा की घाटी होगी इंतज़ार में
दोस्ती की चाह रखने वाले
दुश्मनों का दम्भी दल बैठा तुझे घेरे
तू चाह ना रख, कोई मान न रख
कुछ होने का अभिमान न रख
तो हरा ना पाए , कोई झुका ना पाए
सबके लिए बस सम्मान तू रख
वो ब्यान करते नहीं अपनी ख़ुशबू
क्या उन्हें पता नहीं
या आता नहीं जताना उन्हें
अपनी ख़ुशबू और ख़ूबसूरती का
मैं चला बदलने, जब जहान ये सारा
मैं चला बहुत, फिर थका सफ़र में
जब अविचल हो मैं, खड़ा जगह एक
सब बदल रहा, अरे! कौन ये कर रहा
मैं चला दोबारा, ढूँढने उसको
ना मिला ज़मीन पे , ना मिला आसमा
मैं बायें चला फिर दाएं चला
जिसे ढूंढ रहा, मेरे अंदर से निकला
छिपा हुआ इस सारे जहान से
पूछा उसने तेरी रज़ा क्या है
क्या बदलने तू नासमझ निकला है
तू सोचता तू सब बदल रहा है
मेरे नाटक की ले बस सज़ा या मज़ा है
पानी
झरना कभी , कभी मैं नदी
कभी तालाब, समंदर, बारिश की बूँ
कभी रात तकिये के ग़िलाफ़ मे, मैं धी
और सुबह देख अपनों को , मैं आँ
हूँ नीर कहीं , कहीं जल तो , कहीं चरणामृत बन पूजा जाता हूँ
आँखों से निकला तो आँसूँ
फूलों पे चमका तो औंस की बूँद कहलाता हूँ
कोई तो होगा इस जहान में
जो ख़ुदा की ख़ूबसूरती की इबादत
जिसका ख़ुदा बसता होगा उसके महबू
कोई तो होगा इस जहान में
शक शिकवे शिकायत का शौक़ रखने वा
बहुत दूर चला जाता है ख़ुद से औ
आज बहुत थका-थका सा महसूस कर रहा हूँ
उसने कल रात अपने सपनो में
ख़यालों में अपने च
वो बहता बादल, शांत नदी की लहरों में
ख़ुद को देखता और देख
जो बैचैनी बढ़ती लहरों की
ना बादल दिखता और , किनारा भी कहीं खो जाता
प्रेम की तेरी घनघोर वर्षा मैं
भीगी जो मैं दिन रात
ज़िदें हदें आदतें बिगड़ी
तहस नहस कर गया, वो तूफानी ज़ज़्बात
अब तेरी नफरत की नदी में
मैं गोते खाऊँ दिन रात
खुद को एक बार सम्भालूं फिर से
जो दिखे किनारा, तो खोल दूँ ये पतवार
अनकहे अनसुने अनदेखे
कई सवालों का बड़ी आसानी से
दे देते हैं ये सुझाव
ये पेड़ ये जंगल ख़ामोश कि
बड़े अपने से ये लगते हैं | ये पेड़ नहीं ये अपने
Life is a play. You don't get to pick but perform the role given to you.
It's a live performance
अक्सर कहते है लोग बदल जाते हैं -२
जनाब मैं कहती हूँ
वक़्त बदलता है
वक़्त की चाल बदलती है
लोग तो बस प्यादे भर हैं
जो वक़्त की बिसात पे चले जाते हैं
गम ये नहीं गले लगाया नहीं हमें - २
गम ये है गले लगाने का उनका शौक विदा हो गया
पता नहीं मैं देर से पहुंची
या वक़्त जल्दी पहुंच गया
अब शब्दों और बीती यादों को
ख़ामोशी, समझ और समर्पण का सहारा लेना पड़ता
शब्दों के धागे कच्चे बहुत होते हैं -2
रिश्तों के मोतियों को ख़ामोशी से पिरोना
दोस्ती और दारू जब जब सिर चढ़ बोली है
i शपथ मैंने अपनी पोल ख़ुद ब ख़ुद खोली है
तेरे जैसा दोस्त और वाइन जैसे दारू करोड़ों में एक है
relation अपना honest बाक़ी लगते fake हैं
दारू छूटी, कोई नहीं, पर दोस्त छूटा, में रात भर सोई नहीं
दारू बिना दोस्ती नहीं बनती , दोस्त बिना दारू नहीं खुलती
बात उसूलों की थी वरना रिश्तों की परवाह वो भी करते थे
एक ज़माना था जब उसूलों से ज़्यादा वो हम पे मारते थे
वो उगता सूरज याद दिला गया
उस नवजात शिशु की
जिसे प्यार मिलता सारे जहां का
देखने आते सब गली मोहल्ले के लोग
सूरज-सा चमकता सपनों-भरा उसका चेहरा
वो दिन का सूरज दिखा गया
अब प्यार नहीं पर पड़ती सबकी गाली है
सारा दिन बस चमकता रहता,
गर्मी से अपनी सता रखा
जा कहीं, कुछ तुझको काम नहीं है
वो ढलता सूरज ढांढस बंधा गया
एक बार फिर अपनों का प्यार मिलेगा
वो पहले वाला दुलार मिलेगा
फिर आयेंगे लोग देखने को
सूरज-सा चमकता तजुर्बों भरा, मेरा चेहरा
उसकी सूखी ख्वाहिशें उस सूखी ज़मीन की तरह थे
जहाँ घनघोर बारिश भी हो तो
भाप बनकर उड़ जाती
पूरा करने को सब ख्वाहिशें उस खुदा को सैलाब लाना ही पड़ा
ख़ुद को बिखरने देना नहीं किसी हालात में
लोग गिरते मकान की ईंटे तक उठा लेते हैं
जो आंसू तेरे निकले
तो उन मोतियों के वो हार बना लेंगे
जो चीखे या चिल्लाए
तो उन आवाज़ों से मल्हार वो रचा लेंगे
जो ख़ुद को करा घायल
तो उस लाल रंग कर शृंगार, खुद को सवांरेंगे
ख़ुद को बिखरने देना नहीं किसी हालात में
लोग गिरते मकान की ईंटे तक उठा लेते हैं
हर आशिक़ में एक शायर और एक शायर में आशिक़ छिपा होता है
मिलना तभी होता है जब उसका महबूब जुदा होता है
शराब
कमाल करती है शराब
जब चढ़ती है मुझ पर
तो ख़ुद पी के सो जाती है
ज़ालिम सपनों में मेरे महबूब को जगा आती है
कमाल करती है शराब
बोतल में रहती ख़ामोश
पैमानों में छलक जाती है
जो लग जाये होटों से तो बेख़ुदी से भर जाती है
कमाल करती है शराब
जब महफ़िलों में पीती
तो मदहोशी से भर जाती है
तन्हाइयों में तो उसे , सिर्फ मेहबूब की मुहब्बत याद आती है
तोहमतें बहुत लगी जब होश में वो आ गया
यहाँ इज़्ज़त बहुत देते हैं लोग पीने के बाद
दो आँखें जो देखती थी हमे दिन रात
कहीं दूर बहुत वो चली गई
अनपढ़ थी पर पढ़ लेती जज़्बातों की किताब
कहीं दूर बहुत वो चली गई
चाहने से नहीं मिलता, ख़ुदा देता वही जो लगता उसे ज़रूरी है
चाहे रास्ते कितने भी बदल ले मुसाफ़िर, मंज़िल से लगती हमेशा एक दूरी है
START HERE TO PRINT
कल तक जो लगती गलती थी
आज कल वो social trend है
5-6 boyfriends, one night stand, LGBT experience ना हो
तो लगते आप obsolete हो गयी कोई brand हैं
मियाँ बीवी working couples हुए जब अपने अपने रस्ते
parents old age homes में और बच्चे day care center में हैं बस्ते
आटा अब पिसवाता कौन, गरमागरम रोटी खिलाता कौन
Rotimatic ही सबकी माँ हो गया , वो ही सबका बाप हो गया
अब परिवार के लोगों से ज़्यादा,
वहाँ आवाज़ माँ की पहुंचे न पहुंचे पर data के bytes for sure पहुँच गए
ऊंची नीची कटी फटी jeans वाली नारी, hot babe कहलाती हैं
full sleeves की बस बातें ही अब, मुझे मेरी बेबे की याद दिलाती हैं
wait lunch dinner पे अब , किसका कौन करता है
ubereats का नाम तुम जप लो, सबका पेट वो ही भरता है
family vacation अब भैया, facebook के नाम हो गयी
Tiktok निहारते देखो तुमको, कैसे सुबह से शाम हो गयी
मंगलवार को मंदिर दर्शन और रविवार को रामायण देखा करते
पढ़े लिखे हुए जबसे हम, राम नहीं पर insta, reels दुःख हरते
वो शाम को खेलना दोस्तों के साथ, complete fitness हो जाती
अब कर लो club, kitty, gym, yoga, क्यों रात को नींद नहीं आती
वो भी एक जमाना था जब उड़ती ज़ुल्फ़ें औरत की character पे सवाल उठाती
अब कटा के ज़ुल्फ़ें, मादा बनी मर्द, women empowerment का बवाल है मचाती
जितने complicated mind हुए, उतने धागे relations के उलझे
माँ एक, चार बाप, कौन सा मेरा, ये mystery कैसे सुलझे
जो बदले ना तुम साथ समय के तो rat race हार जाओगे
जो हार गए तो लेना ये इशारा, की प्रभु को अब तुम पाओगे
जीवन मेरा फूलों की डाली सा
भर गया, लद गया , झुक गया
वो चंचल बहता नीर, शांत सरोवर में जाकर, कहीं रुक गया
रुका तो पाया, खोने को कुछ नहीं इस जहान में
जब पाया उसने , तो जाने कहाँ दुख गया, सुख गया
ज़ख्मो से भरा नहीं दिल उनका, कि हर एक ज़ख़्म पे अपने, वो वाह वाह करते है
कोई जाए और समझाए उन्हें, दर्द में उनके, हम किस तरह आहें भरा करते हैं
एक चाक पे घूमता मेरा जीवन
उस कुम्हार की मटकी सा बनता ये जीवन
थापे पड़ती रही हर ओर से
पर तेरे नाम ने अंदर हमें सम्भाले रखा
अच्छा हो गया, बुरा हो गया
जो होना था, वही हो गया
ना मैं रचता, ना निर्माता
बस खेल खेल में खेलता जाता
कभी जीतता , मैं जो जाता
तो ख़ुदा बन के पूजा जाता
जो हारता इस खेल जगत का
तो दस सिर का रावण कहलाता
वो पत्नी ढूँढती पति में सहारा
वो पति का सहारा पत्नी में।
वो बच्चे का सहारा माँ बाप है
माँ बाप ढूँढे भगवान में।
वो इंसान सहारे जब भगवान चला
भगवान सहारे इंसान चला।
ना कोई रुका , ना कोई झुका
हर इंसान में जब भगवान् दिखा।
उस दिन वो खुद में ख़ुदा हो गया
सब सहारों से बेपरवाह और जुदा हो गया।
बात उसूलों की थी वरना रिश्तों की परवाह वो भी करते थे
एक ज़माना था जब उसूलों से ज़्यादा वो हम पे मारते थे
LP
वो उगता सूरज याद दिला गया
उस नवजात शिशु की
जिसे प्यार मिलता सारे जहां का
देखने आते सब गली मोहल्ले के लोग
सूरज सा चमकता उसका कोमल चेहरा
वो दिन का सूरज समझा गया
अब प्यार कहीं नहीं पर पड़ती गाली है
सारा दिन बस चमकता रहता,
गर्मी से अपनी सता रखा
जा कहीं, कुछ तुझको काम नहीं है
वो ढलता सूरज दिखा गया
जब शाम ढलेगी ज़िंदगी की
एक बार फिर अपनों का प्यार मिलेगा
वो पहले वाला दुलार मिलेगा
फिर आयेंगे लोग देखने को
सूरज सा चमकता तजुर्बों भरा चेहरा
उसकी सूखी ख्वाहिशें उस सूखी ज़मीन की तरह थे
जहाँ घनघोर बारिश भी हो तो
भाप बनकर उड़ जाती
पूरा करने को सब ख्वाहिशें उस खुदा को सैलाब लाना ही पड़ा
LP
ख़ुद को बिखरने देना नहीं किसी हालात में
लोग गिरते मकान की ईंटे तक उठा लेते हैं
जो आंसू तेरे निकले
तो उन मोतियों के वो हार बना लेंगे
जो चीखे या चिल्लाए
तो उन आवाज़ों से मल्हार वो रचा लेंगे
जो ख़ुद को करा घायल
तो उस लाल रंग कर शृंगार, खुद को सवांरेंगे
ख़ुद को बिखरने देना नहीं किसी हालात में
लोग गिरते मकान की ईंटे तक उठा लेते हैं
हर आशिक़ में एक शायर और एक शायर में आशिक़ छिपा होता है
मिलना तभी होता है जब उसका महबूब जुदा होता है
शराब
कमाल करती है शराब
ना समय का होश उसे
ना परवाह जगह की वो करती है
जब चढ़ती है मुझ पर तब क़यामत ही क़यामत बरसती है
कमाल करती है शराब
बोतल में रहती ख़ामोश
पैमानों में छलका करती है
जो लग जाये होटों से जिसके, उसे बे-आबरू सरेआम करती है
कमाल करती है शराब
जब महफ़िलों में पी ली जाती
तब ही कातिल अदायें उतरती है
तन्हाइयों में वो आँसूओं से मेरा जाम, साकी बन भरती है
तोहमतें बहुत लगी जब होश में वो आ गया
यहाँ इज़्ज़त बहुत देते हैं लोग पीने के बाद
दो आँखें जो देखती थी हमे दिन रात
कहीं दूर बहुत वो चली गई
अनपढ़ थी पर पढ़ लेती जज़्बातों की किताब
कहीं दूर बहुत वो चली गई
चाहने से नहीं मिलता, ख़ुदा देता वही जो लगता उसे ज़रूरी है
चाहे रास्ते कितने भी बदल ले मुसाफ़िर, मंज़िल से लगती हमेशा एक दूरी है
START HERE TO PRINT
कल तक जो लगती गलती थी , आज कल वो social trend है
5-6 boyfriends, one night stand, LGBT experience ना हो, तो लगते आप obsolete हो गयी कोई brand हैं
मियाँ बीवी जबसे working couples हुए, चल दिए फिर अपने अपने रस्ते
parents old age homes में, और बच्चे day care center में ही हसते और बसते
आटा अब पिसवाता कौन, गरमागरम रोटी खिलाता कौन
Rotimatic ही सबकी माँ हो गया , वो ही सबका बाप हो गया
अब परिवार के लोगों से ज़्यादा,
वहाँ आवाज़ माँ की पहुंचे न पहुंचे पर data के bytes बिना कुछ कहे पहुँच गए
ऊंची नीची कटी फटी jeans वाली नारी, hot babe कहलाती हैं
दुपट्टे की बस बातें ही अब, मुझे मेरी बेबे की याद दिलाती हैं
wait lunch dinner पे अब , किसका कौन करता है
ubereats का नाम तुम जप लो, पेट सबका वो ही भरता है
family vacation अब भैया, facebook के नाम हो गयी
Tiktok निहारते देखो तुमको, कैसे सुबह से शाम हो गयी
मंगलवार को मंदिर दर्शन और रविवार को रामायण देखा करते
पढ़े लिखे हुए जबसे हम, राम नहीं अब, insta, reels दुःख हैं हरते
वो शाम को खेलना दोस्तों के साथ, complete fitness हो जाती
अब कर लो club, kitty, gym, yoga, क्यों रात को नींद नहीं आती
वो भी एक जमाना था जब उड़ती लहराती ज़ुल्फ़ें औरत की character पे सवाल उठाती
अब कटा के ज़ुल्फ़ें, मादा बनी मर्द, women empowerment का बवाल है मचाती
जितने complicated mind हुए, उतने धागे relations के उलझे
एक mom पर चार पिताजी, कौन सा मेरा, ये mystery कैसे सुलझे
जो बदले ना तुम साथ समय के साथ तो rat race हार जाओगे
जो हार गए तो जीते बाजी, अब nirvana का धन तुम पाओगे
जीवन मेरा फूलों की डाली सा
भर गया, लद गया , झुक गया
वो चंचल बहता नीर, शांत सरोवर में जाकर, कहीं रुक गया
रुका तो पाया, खोने को कुछ नहीं इस जहान में
जब पाया उसने , तो जाने कहाँ दुख गया, सुख गया
शायद ज़ख्मो से भरा नहीं दिल उनका-२ , कि हर एक ज़ख़्म पे अपने, वो वाह वाह करते है
कोई जाए और समझाए उन्हें, दर्द में उनके, हम किस तरह आहें भरा करते हैं
एक चाक पे घूमता मेरा जीवन
उस कुम्हार की मटकी सा बनता ये जीवन
थापे पड़ती रही हर ओर से
पर तेरे नाम ने अंदर हमें सम्भाले रखा
मन जब तन से भर जाएगो , तब चक्षु सब खुल जावेंगे
खेल
अच्छा हो गया, बुरा हो गया
जो होना था, वही हो गया
ना मैं रचता, ना निर्माता
बस खेल खेल में खेलता जाता
कभी जीतता , मैं जो जाता
तो बन के राम पूजा जाता
हार जब जाता इस खेल जगत का
तो दस सिर का रावण कहलाता
माया रूपी जग मिला, तो कैसे मिलें प्रभु श्री राम
प्रभु कृपा जब होएगी तो, छू ना पावें विषय और काम
माया रूपी जग मिला, तो कैसे मिलें नन्दलाल
जो कृष्णमंत्र का जाप करे, वो सदा रहें मालामाल
अच्छी बातें
तुझसे मिलने पे कुछ अच्छी बातें हुई
ये दिल रूठा
अपने होने का भ्रम टूटा । बहुत कुछ छूटा
विश्वास का पात्र ऐसा टूटा
लगता अब सब झाँसा और झूठा
माया का संसार जिसने मेरा लूटा
वो प्रभु मिला गया, तो अब कौन है रूठा
LP
कोई ढूँढे पथर में
कोई मांस मज़्ज़ा में
कोई चीर आसमान का सीना
घुस गया कोई पताल में
कोई उल्टा लटके घंटो
कोई झुका नमाज़ में
आंख मूँद, कोई घंटी बजाये
कोई सुनता अजान की आवाज़ में
सब ढूँढ रहे पर पता नहीं
कहाँ राम छिपा, ना रहीम दिखा
जो बैठ गये थक हार के हम
तो तुझमे मुझमे वो एक ही दिखा
मेरे प्रभु से गलती हो नहीं सकती
जो मन मुताबिक़, वो तन को भाया
जब दुख आया तो, मन घबराया
बंद आँख से, लगे जग अपना
जो आँख खुली तो, सब प्रभु की माया
मेरे प्रभु से गलती हो नहीं सकती
अनुभव की जब किताब भरी तो
आरती संग्रह भी काम ना आया
कर्मों की जब आँधी उड़ी तो
आस्था का, ध्वज रज में लहराया
मेरे प्रभु से गलती हो नहीं सकती
सच जानने के लिए कुछ दूरी ज़रूरी है
सच्ची मुहब्बत, होती ख़ामोशी से पूरी है
भेद
हँसता मुझ पे, तू संसारी, हंस ले खुद पे तो उद्धार हुआ
ढूंढता क्या तू इधर- उधर, तू झाँक अंदर और पार हुआ
क्या जोड़ता अम्बार संबंधों के , तू तोड़ के रिश्ते कर्म मुक्त हुआ
भोग विलास में निकला जीवन , भरा हुआ मन अब रिक्त हुआ
भावे दुनिया के पड़पंच जहाँ पे , रंगमंच का किरदार ,मैं विरक्त हुआ
करो कुछ ऐसे, जैसे तुमने कुछ किया नहीं
भोगो ऐसे जैसे तुम्हे कभी कुछ मिला नहीं
त्यागो ऐसे जैसे कभी जरूरत नहीं
आज (present)जो है वो कल (yesterday) बन जाएगा
कल(future) तो क़ादिर कल (tomorrow) ही आएगा
जियो ऐसे की कोई कल (past or future) नहीं है
जो मरोगे पल में, कल कहीं नहीं है
गाड़ियाँ बहुत थी
खड़ी उस सड़क पर
ना कोई हलचल ना कोई आवाज़
कैसा वीराना, सन्नाटा
इस मेरे मन में
ना मौत की दस्तख, ना ज़िन्दगी की आ
ध्यान अपना राखिये, तो रख सकें दू
मान सबका राखिए, तो बढ़े आपको मा
जीवन ऐसा मैं जियूँ ,जो आये दू
अगली यात्रा को निकल पड़ूँ, पर पीछे र
नई दुल्हन-सा वो पेड़
पतझड़ में विधवा हो गया था
लगता था जैसे कहीं यौवन उसका खो गया था
नहीं- नहीं, वो तो बसंत की तैयारी कर र
पास गया,पाया, कुछ कोपिले फूटती थीं उसपे
वो फिर से जवानी की हवाओं पे सवारी कर रहा था
उसकी खामोश नज़रों का कोई क़सूर नहीं -२
शायद मेरी मुहब्बत में अब वो सुरूर नहीं
लगता है मेरे मुक़द्दर में बस इतना ही इश्क़ लिखा था-२
खुदा मिला तुझमे जब अपना , लगता कोई अब साहिब-ए-सुरूर नहीं
वो पौधा मेरे बग़ल में ही था
और मुझे पता भी ना चला
पर जब हाथ पड़ा मेरा उसपर और वो
मैं उसे आज तक भूल ना पाया
सारी उम्र निकल दी
इस होश को साधने में -२
पर जब सधा मेरा ये होश
तो बहुत देर हो चुकी थी
नई ज़िंदगी की बिगुल बज चुकी थी
बहुत देर हो चुकी थी
बीज
वो बीज ज़मीन के अंधेरे में
नरमी में गर्मी में
सिकुड़ा, घबराया, शर्माया सा बी
आँधी,बारिश, पेरों की थापो से कँ
जब जागा एक लंबी नींद से वो
वो पौधा बनकर जब उठा
वो बीज अब कहीं नहीं था
वो पलों की तरह कहीं खो गया
वो उस पौधे में बीज बन फिर सो गया
बातों और बीती यादों की परतों में दबा-दबा सा जीवन
क्या सच है या एक सपना
खोजता हूँ ख़ुद को इन परतों में,
लगूं मैं कभी पराया और कभी अपना
कितने sunrise and sunset दिखाए तुमने
रिमझिम बूँदों में चाय मग्गी खि
हाथ पकड़ कभी पहाड़ चढ़ा दिया
तैरती मछ
समझदारी ने तेरी, छोड़ा नहीं मेरे बचपने का साथ
ग़ुस्सा जो मैं हो जाऊं, तो खिलाया खाना अपने हाथ
ज़िन्दगी के हर रंग से परिचय करवा दिया
तुमने मुझ को मुझसे मिलवा दिया
शिद्दत से भरा मेहबूब मिले, ये बस किस्मत की बात है
ज़िद्द और ज़ज़्बात से भरा, तू उस कुदरत की करामात है
मैं मिलता जुलता लोगों से
मैं ख़ुद से मिलता कभी नहीं
अपने से मिलने को रोज़ रोज़
कितना शोर शराबा चाहिए मुझे भई
मैं चाहता पैसा गाड़ी और मकान
मन फिर भी मेरा भरता नहीं
फटी हुई है झोली मेरी
मैं भिखारी बस इस एक जनम का नहीं
मैं होता खुश, मैं होता खुश , तो लोगों का साथ
रोता तो कोई पास आता नहीं
सबकी अपनी राहें , सबकी अपनी मंज़ि
सबकी अपनी राहें , सबकी अपनी मंज़ि
कडु सच है दोस्तों
पर अंत समय में साथ कोई निभा सकता न
उस तूफ़ान के बाद ताज़गी को महसूस किया मेने
जब सूरज ऊगा था, सिर उठा के
बदचलन बादल हट गए घबरा के
जब किरणों ने चूमा खिलखिला के
नयी नवेली कोपलों को
जो शर्मा के बैठी इंतज़ार में
उस तूफानी बारात के विदा होने का
खा लिया पी लिया भोग लिया
और में भी गई कितनी बदल
वक़्त बदला
वक़्त की चाल बदली
ख़ाली झोली लेके मैं अपने महबूब
और वो तो दर-बदर का भिखारी नि
पर जो कुछ था उसकी झोली में,
सब
रब से बड़ा मेरे महबूब का जिगरा
उसकी बातों ने मेरे महसूस को चू
जैसे उनका निकाह हो गया
और में चुप हो गया
जज़्बातों ने मेरी, उसके आँसुओं
जैसे कोई दोस्ताना हो गया
और में चुप हो गया
मेरी ख़ूबसूरती को तराशतीं उसकी
उस कारीगर पे दिल बेमिसाल हो गया
और में चुप हो गया
काला धागा , अग्नि, मंत्र कर सक
पर उन्हें ताउम्र निभाने को चा
जहां धागों में दुख-सुख के मनके
जहां अग्नि पावन प्रेम की धधकती
जहां एहसासों का मंत्रोच्चरण सु
वो रिश्ते पाक-परवरदिगार हो जा
वो घर काबा बन जाते हैं
ज़रा हवा चलने से
कभी फूल पौधे से जुदा हुआ है
वो तो आँधी आयी थी उस दिन
उन्हें अलग करने को
मेरे प्रभु मेरे राधे श्याम
लिखता कविता, गाता उसके गान
करता पूजा अर्चना, रख दिये कितने
मेरे प्रभु मेरे राधे श्याम
ढूँढने चल देता, उसे सुबह और शाम
खींचता तस्वीरे ,कभी फूलों की कभी पत्थर की
मेरे प्रभु मेरे राधे श्याम
उठता ब्रह्म मुहूर्त, रोज़ करता
जोड़ता उससे बंधन ,करता शरीर की
मेरे प्रभु मेरे राधे श्याम
खाता,बोलता, हस्ता, रोता सुबह से शाम
ढूँढता ज़रिए, समाने के उस असीम
मेरे प्रभु मेरे राधे श्याम
करता भेंट हर कर्म मैं अपना, उस
कर्म ,बुद्धि, भक्ति से चाहा पाना,
मेरे प्रभु मेरे राधे श्याम
छिपा हुआ तू कहीं नहीं , जो ढूँ
बस मैं तुझमें, तू मुझमें, बहते
मेरे प्रभु मेरे राधे श्याम
कैमरे की रील पे उतार लो कितना
ये बदलते बदलों सी ज़िंदगी है
ना कुछ रोक पाओगे
ना फिर वो वक़्त वापिस ला पाओगे
जब तजुर्बों के पन्ने भरने लगे
वो आँधी आयी थी उस दिन,
खुल गई
जिसके हाथ जो पन्ना लगा
कोई दोस्त , कोई दुश्मन बन गया
किसी ने की घृणा, कोई दया कर गया
और उस दिन मेरी किताब में एक प
छिपा दूँगा किताब
जला दूँगा किताब
पर ना खुलने दूँगा जनाब
ये किताब नहीं है
ये तो जज़्बातों की स्याही से लि
मैं मिला उससे जब पहली बार
वो कोई ख़ास दिल के बहुत पास
बस समझ नहीं आया
"मैं" वो हूँ जो है ख़ास
या फिर जो मिला मुझसे पहली बार
जब आयी ज्ञान की आँधी
तो ना ज्ञानी बचा, ना बचा उसका ज्ञा
उड़ा ले गई अपने संग वो
काम, क्रोध, इच्छा, अभिमान
हवा से खुलता बंद होता वो बग़ल
अट्टहास करता
मेरी उन २ बेज़ु
जो गड गई थी उस पे कीलें बनके
कोयल की कूक सा -sweet
गूँगे की मूक सा -silent
नयी दुल्हन की भूलचुक सा - simple n innocent
तेरा प्यार सदा रहा बरसता, मु
पर वहाँ ना पानी था ना बादल थे
ना शिव, ना बुध, ना महावीर है बनना
ना बनना राम, कृष्ण, हनुमान
बस सीख लूँ जीवन से इनके -२
त्यागूँ मैं या त्यागे मुझे धन, वैभव, अभिमान
यह जीवन एक लीला है
दुनिया एक रंग मंच,
जहाँ चल रहा ना
किरदार निभा जब विदा मैं लूँ तो
यार -ए -गार ज़रा गौर फरमा तू
देख रूमाल तेरा भी है गीला
चला बहुत मैं, मैं बहुत चला
फिर ठोकर लगी और मैं गिर भी गया
फिर उठा संभल के, फिर चलने को
फिर ठोकर और फिर से गिरने को
मुझे मिले राह में मुसाफ़िर कितने
ज़िंदगी ने मिलाया, फिर सपना बना
लेकर सबकी यादों को चला
चला बहुत मैं, मैं बहुत चला
चोट खायी और लड़खड़ाया मैं
कभी प्यास जगी, कभी भूख लगी
कोई दवा दे गया, कोई दे गया दारू
जिस्मों के बाज़ार से,
कादिर, मैं निकला कुछ
ना ख़ुद रुका ना ये जिस्म रुका
चला बहुत मैं, मैं बहुत चला
जहाँ प्रेम हो , पर इज़हार नहीं
जहाँ ख़ूबसूरती हो, पर आइना नहीं
वफ़ा की चादर में लिपटे हुए हम तुम
जहाँ तनहाइयाँ हो, पर बेवफाई नहीं
जहाँ शर्मो हया हो, पर कोई पर्दा नहीं
जहाँ प्यास हो जन्मो की, पर जिस्म की चाह नहीं
उस दीदार के लिए तरसते हुए हम तुम
जहाँ इंतज़ार हो , पर वक़्त का कुछ पता नहीं
आज फिर से कोशिश थी, ख़ुद से ही मि
पर ख़ुशबूदार गुलाबों और चुभते
यादों और बातों की बगिया से नि
आज फिर ख़ुद ही खुद से मैं मिल ना सका
खबर दी तुमको ये किसने मेरी-2
हम तो, ख़ुद से खुद ही बेखबर इतने
काश अब होश में आ जाएँ हम- तुम
ना हम-तुम रहेंगे न खबरें रहेंगी
मैं तो बस एक रिक्त स्थान हूँ
जो भर रहा हूँ , हर रोज़ ,हर वक़्
शब्दों से, वाक्यों से ,
और कुछ दिलचस्प कहानियों से
अनजानों की लम्हे जैसी बातों से
रिश्तों और परिचितों के वाद वि
भर रहा तिजोरी कुछ बेशक़ीमती पत्थ
और कर दी दीवाल बोझिल ओहदों की
दो साँसों के बीच बची थी
उस जगह , जगत कुछ भरने लगा
मान मर्यादा के मनके पिरोये , संस्कारों की लम्बी माला में
सबने मिल अभिमान भरा, भरा चाहतों का घड़ा बड़ा
बड़ा घड़ा जब टूट गया, तो शुरू से मैं फिर शुरू हुआ
अब कहता मैं सन्यासी हूँ ,
फिर घड़ा धर्म का ले आया
क्या जीवन मेरा सिर्फ भरने को हुआ
में तो बस एक रिक्त स्थान हूँ
जो भर रहा हूँ, हर रोज़, हर वक़्
मान की चाह रखने वाले
अपमान दबे पाँव आता होगा
सफलता की चाह रखने वाले
विफलता का झंडा फहराता ही होगा
प्रेम की चाह रखने वाले
घृणा की घाटी होगी इंतज़ार में
दोस्ती की चाह रखने वाले
दुश्मनों का दम्भी दल बैठा तुझे घेरे
तू चाह ना रख, कोई मान न रख
कुछ होने का अभिमान न रख
तो हरा ना पाए , कोई झुका ना पाए
सबके लिए बस सम्मान तू रख
वो ब्यान करते नहीं अपनी ख़ुशबू
क्या उन्हें पता नहीं
या आता नहीं जताना उन्हें
अपनी ख़ुशबू और ख़ूबसूरती का
मैं चला बदलने, जब जहान ये सारा
मैं चला बहुत, फिर थका सफ़र में
जब अविचल हो मैं, खड़ा जगह एक
सब बदल रहा, अरे! कौन ये कर रहा
मैं चला दोबारा, ढूँढने उसको
ना मिला ज़मीन पे , ना मिला आसमा
मैं बायें चला फिर दाएं चला
जिसे ढूंढ रहा, मेरे अंदर से निकला
छिपा हुआ इस सारे जहान से
पूछा उसने तेरी रज़ा क्या है
क्या बदलने तू नासमझ निकला है
तू सोचता तू सब बदल रहा है
मेरे नाटक की ले बस सज़ा या मज़ा है
पानी
झरना कभी , कभी मैं नदी
कभी तालाब, समंदर, बारिश की बूँ
कभी रात तकिये के ग़िलाफ़ मे, मैं धी
और सुबह देख अपनों को , मैं आँ
हूँ नीर कहीं , कहीं जल तो , कहीं चरणामृत बन पूजा जाता हूँ
आँखों से निकला तो आँसूँ
फूलों पे चमका तो औंस की बूँद कहलाता हूँ
कोई तो होगा इस जहान में
जो ख़ुदा की ख़ूबसूरती की इबादत
जिसका ख़ुदा बसता होगा उसके महबू
कोई तो होगा इस जहान में
शक शिकवे शिकायत का शौक़ रखने वा
बहुत दूर चला जाता है ख़ुद से औ
आज बहुत थका-थका सा महसूस कर रहा हूँ
उसने कल रात अपने सपनो में
ख़यालों में अपने च
वो बहता बादल, शांत नदी की लहरों में
ख़ुद को देखता और देख
जो बैचैनी बढ़ती लहरों की
ना बादल दिखता और , किनारा भी कहीं खो जाता
प्रेम की तेरी घनघोर वर्षा में
भीगी जो में दिन रात
ज़िदें हदें आदतें बिगड़ी
सब तहस नहस कर गया
वो तूफानी ज़ज़्बात
अब नफरत की तेरी नदियां में
गोते खाऊँ दिन रात
खुद को फिर से एक बार सम्भालूं
दिखे कहीं जो मुझे किनारा
खोल दूँ ये पतवार
अनकहे अनसुने अनदेखे
कई सवालों का बड़ी आसानी से
दे देते हैं ये सुझाव
ये पेड़ ये जंगल ख़ामोश कि
बड़े अपने से ये लगते हैं | ये पेड़ नहीं ये अपने
Life is a play. You don't get to pick but perform the role given to you.
It's a live performance
अक्सर कहते है लोग बदल जाते हैं -२
जनाब मैं कहती हूँ
वक़्त बदलता है
वक़्त की चाल बदलती है
लोग तो बस प्यादे भर हैं
जो वक़्त की बिसात पे चले जाते हैं
गम ये नहीं गले लगाया नहीं हमें - २
गम ये है गले लगाने का उनका शौक विदा हो गया
पता नहीं मैं देर से पहुंची
या वक़्त जल्दी पहुंच गया
अब शब्दों और बीती यादों को
ख़ामोशी, समझ और समर्पण का सहारा लेना पड़ता
शब्दों के धागे कच्चे बहुत होते हैं -2
रिश्तों के मोतियों को ख़ामोशी से पिरोना
दोस्ती और दारू जब जब सिर चढ़ बोली है
i शपथ मैंने अपनी पोल ख़ुद ब ख़ुद खोली है
तेरे जैसा दोस्त और वाइन जैसे दारू करोड़ों में एक है
relation अपना honest बाक़ी लगते fake हैं
दारू छूटी, कोई नहीं, पर दोस्त छूटा, में रात भर सोई नहीं
दारू बिना दोस्ती नहीं बनती , दोस्त बिना दारू नहीं खुलती
बात उसूलों की थी वरना रिश्तों की परवाह वो भी करते थे
एक ज़माना था जब उसूलों से ज़्यादा वो हम पे मारते थे
वो उगता सूरज याद दिला गया
उस नवजात शिशु की
जिसे प्यार मिलता सारे जहां का
देखने आते सब गली मोहल्ले के लोग
सूरज-सा चमकता सपनों-भरा उसका चेहरा
वो दिन का सूरज दिखा गया
अब प्यार नहीं पर पड़ती सबकी गाली है
सारा दिन बस चमकता रहता,
गर्मी से अपनी सता रखा
जा कहीं, कुछ तुझको काम नहीं है
वो ढलता सूरज ढांढस बंधा गया
एक बार फिर अपनों का प्यार मिलेगा
वो पहले वाला दुलार मिलेगा
फिर आयेंगे लोग देखने को
सूरज-सा चमकता तजुर्बों भरा, मेरा चेहरा
उसकी सूखी ख्वाहिशें उस सूखी ज़मीन की तरह थे
जहाँ घनघोर बारिश भी हो तो
भाप बनकर उड़ जाती
पूरा करने को सब ख्वाहिशें उस खुदा को सैलाब लाना ही पड़ा
ख़ुद को बिखरने देना नहीं किसी हालात में
लोग गिरते मकान की ईंटे तक उठा लेते हैं
जो आंसू तेरे निकले
तो उन मोतियों के वो हार बना लेंगे
जो चीखे या चिल्लाए
तो उन आवाज़ों से मल्हार वो रचा लेंगे
जो ख़ुद को करा घायल
तो उस लाल रंग कर शृंगार, खुद को सवांरेंगे
ख़ुद को बिखरने देना नहीं किसी हालात में
लोग गिरते मकान की ईंटे तक उठा लेते हैं
हर आशिक़ में एक शायर और एक शायर में आशिक़ छिपा होता है
मिलना तभी होता है जब उसका महबूब जुदा होता है
शराब
कमाल करती है शराब
जब चढ़ती है मुझ पर
तो ख़ुद पी के सो जाती है
ज़ालिम सपनों में मेरे महबूब को जगा आती है
कमाल करती है शराब
बोतल में रहती ख़ामोश
पैमानों में छलक जाती है
जो लग जाये होटों से तो बेख़ुदी से भर जाती है
कमाल करती है शराब
जब महफ़िलों में पीती
तो मदहोशी से भर जाती है
तन्हाइयों में तो उसे , सिर्फ मेहबूब की मुहब्बत याद आती है
तोहमतें बहुत लगी जब होश में वो आ गया
यहाँ इज़्ज़त बहुत देते हैं लोग पीने के बाद
दो आँखें जो देखती थी हमे दिन रात
कहीं दूर बहुत वो चली गई
अनपढ़ थी पर पढ़ लेती जज़्बातों की किताब
कहीं दूर बहुत वो चली गई
चाहने से नहीं मिलता, ख़ुदा देता वही जो लगता उसे ज़रूरी है
चाहे रास्ते कितने भी बदल ले मुसाफ़िर, मंज़िल से लगती हमेशा एक दूरी है
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कल तक जो लगती गलती थी
आज कल वो social trend है
5-6 boyfriends, one night stand, LGBT experience ना हो
तो लगते आप obsolete हो गयी कोई brand हैं
मियाँ बीवी working couples हुए जब अपने अपने रस्ते
parents old age homes में और बच्चे day care center में हैं बस्ते
आटा अब पिसवाता कौन, गरमागरम रोटी खिलाता कौन
Rotimatic ही सबकी माँ हो गया , वो ही सबका बाप हो गया
अब परिवार के लोगों से ज़्यादा,
वहाँ आवाज़ माँ की पहुंचे न पहुंचे पर data के bytes for sure पहुँच गए
ऊंची नीची कटी फटी jeans वाली नारी, hot babe कहलाती हैं
full sleeves की बस बातें ही अब, मुझे मेरी बेबे की याद दिलाती हैं
wait lunch dinner पे अब , किसका कौन करता है
ubereats का नाम तुम जप लो, सबका पेट वो ही भरता है
family vacation अब भैया, facebook के नाम हो गयी
Tiktok निहारते देखो तुमको, कैसे सुबह से शाम हो गयी
मंगलवार को मंदिर दर्शन और रविवार को रामायण देखा करते
पढ़े लिखे हुए जबसे हम, राम नहीं पर insta, reels दुःख हरते
वो शाम को खेलना दोस्तों के साथ, complete fitness हो जाती
अब कर लो club, kitty, gym, yoga, क्यों रात को नींद नहीं आती
वो भी एक जमाना था जब उड़ती ज़ुल्फ़ें औरत की character पे सवाल उठाती
अब कटा के ज़ुल्फ़ें, मादा बनी मर्द, women empowerment का बवाल है मचाती
जितने complicated mind हुए, उतने धागे relations के उलझे
माँ एक, चार बाप, कौन सा मेरा, ये mystery कैसे सुलझे
जो बदले ना तुम साथ समय के तो rat race हार जाओगे
जो हार गए तो लेना ये इशारा, की प्रभु को अब तुम पाओगे
जीवन मेरा फूलों की डाली सा
भर गया, लद गया , झुक गया
वो चंचल बहता नीर, शांत सरोवर में जाकर, कहीं रुक गया
रुका तो पाया, खोने को कुछ नहीं इस जहान में
जब पाया उसने , तो जाने कहाँ दुख गया, सुख गया
ज़ख्मो से भरा नहीं दिल उनका, कि हर एक ज़ख़्म पे अपने, वो वाह वाह करते है
कोई जाए और समझाए उन्हें, दर्द में उनके, हम किस तरह आहें भरा करते हैं
एक चाक पे घूमता मेरा जीवन
उस कुम्हार की मटकी सा बनता ये जीवन
थापे पड़ती रही हर ओर से
पर तेरे नाम ने अंदर हमें सम्भाले रखा
अच्छा हो गया, बुरा हो गया
जो होना था, वही हो गया
माया रूपी जग मिला, तो कैसे मिलें प्रभु श्री राम
प्रभु कृपा जब होएगी तो, छू ना पावें विषय और काम
माया रूपी जग मिला, तो कैसे मिलें नन्दलाल
जो कृष्णमंत्र का जाप करे, वो सदा रहें मालामाल
तुझसे मिलने पे कुछ अच्छी बातें हुई
ये दिल रूठा
अपने होने का भ्रम टूटा । बहुत कुछ छूटा
विश्वास का पात्र ऐसा टूटा
लगता अब सब झाँसा और झूठा
माया का संसार जिसने मेरा लूटा
वो प्रभु मिला गया, तो अब कौन है रूठा
कोई ढूँढे पथर में
कोई मांस मज़्ज़ा में
कोई चीर आसमान का सीना
घुस गया कोई पताल में
कोई उल्टा लटके घंटो
कोई झुका नमाज़ में
आंख मूँद, कोई घंटी बजाये
कोई सुनता अजान की आवाज़ में
सब ढूँढ रहे पर पता नहीं
कहाँ राम छिपा, ना रहीम दिखा
जो बैठ गये थक हार के हम
तो दर्शन दिए हर इंसान में
मेरे प्रभु से गलती हो नहीं सकती
जो मन मुताबिक़, वो सुख कहलाया
जब दुख आया तो, मन घबराया
बंद आँख से, लगे जग अपना
जो आँख खुली तो, सब प्रभु की माया
मेरे प्रभु से गलती हो नहीं सकती
इस मांस मज्ज़ा का ज्ञान हुआ तो
जो भूल हुई, फिर मन पछताया
स्वाद भरे रोमांच भरे ,
परनिंदा को , फिर मुँह ना लगाया
मेरे प्रभु से गलती हो नहीं सकती
जो दिया प्रभु ने, वो सिर माथे पर
जो मिला ना उसको, हाथ जोड़ आया
सब जग घूमा और ढूँढा उसको
जब बैठ गया, तब मैंने पाया
मेरे प्रभु से गलती हो नहीं सकती
हकीकत हूँ या ख्वाब हूँ
लगती पूरी, पर आधी भरी शराब हूँ
क्या मैं उसका ग़ुरूर हूँ
या अपनी मुहब्बत का सुरूर हूँ
इच्छाओं को पहना दिया जिस्म का जामा है
या मैं इस मन का फालतू फ़ितूर हूँ
रोक ना पायेगा मुझे
निकल पड़ी घर से एक दिन में, जाने किस और
फिर छूट गया घर, छूट गया रास्ता और खो गई मैं
मिला जंगली जानवर तो डर के पनहा ली एक मकान में
ऐश-ओ -आराम के जहान में
कुछ देर रुक के चलूँगा फिर , ऐसा मन ने समझा दिया
बुद्धि ने परखा जब, मिलकर सब ने विवेक को भगा दिया
रस गई मैं , बस गई मैं । प्रेम सागर में धँस गई मैं
जब जंगली जानवर निकल कमरे से आया मेरी और
तब पता चला कि शायद ग़लत ही फँस गई मैं
भागी सरपट, मैं खो गई थी
जगी तो जाना, लंबा सो गई थी
फिर ढूँढ के ख़ुद को,
ढूँढा वो रास्ता, जो ले जायेगा मुझे मेरे घर की और
अब न रोक पायेगा कोई मकान , कोई ऐशो आराम
कोई जानवर, कोई भी इंतज़ाम
ना चाह ना राह
ना ढूँढता कोई दिशा
ना मेरी कोई मंज़िल
ना मुझे कोई परवाह
में उड़ता बादल बाँवरा
चल देता किसी दिशा
कोई
चार लोग और इनकी चार बातें
संसार इसमें समा गया
कोई तारीफ़ों के पुल बांधे
कोई गहरी खाइयों में धकेल गया
सच का आईना दिखा गया
कोई काँच के मंसूबी महल तोड़ गया
महकाया मन की बगिया को जिसने
वो मालिक बनके फिर बैठ गया
कोई मौसम के जैसे आता जाता
कोई ठसक सा बनके ठहर गया
एक दिन मौसम को मैंने बदलते देखा
आंधी को बादल से लड़ते देखा
पहले मनुहार करी, फिर धक्का भी दिया
पर बादल था ज़िद्दी टस से मस ना हुआ
बड़ी जिद्दों जेहेद और खीचतान के बाद
भावविभोर हो जब बादल रो पड़ा
तो आंधी ने फिर मांगी माँफी
वो हवा बन गयी तो बादल उड़ गया
सुख के बाद आता क्यों दुख
दुख की पीड़ा को जो सहन कर गया
परमात्मा की आँख में वो तर गया
वो रहा नहीं इंसान अब मगर
वो ही परमात्मा का स्वरूप बन गया
दुख की पीड़ा को जो सहन कर जाते हैं
जनक दुलारे, सीता के प्यारे , भगवान राम बन पाते हैं
जो दुख आने पे विध्वंस मचाते है
वो नंद के लाल, बाल गोपाल , राधेश्याम कहलाते हैं
सबको देने वाला सबकी लेने वाला
जब सब कुछ करने वाला वो
तो नीच बीच में आता कैसे
बन भगवान कोई समझाता कैसे
उसके रूप २-४ नहीं
सदाचार और व्यभचार वही
दुख के आंसू सुख की साँसे
वही है दानव भगवान वही
समझ इतनी नहीं थी कि समझ पाती तुझको
समझ इतनी नहीं थी कि समझ पाती तुझको
जब समय ने समझ दी तो समझा लिया ख़ुद को
तू समझ से नहीं समझा जा सकता
समय से ही समझ आया मुझको
जितना ख़ुद के क़रीब आओगे
उतना ख़ुदा को क़रीब पाओगे
जिसे मिला ना कुछ उसे ख़ुदा भी ना मिला
जिसे मिला सब कुछ उसे भी ख़ुदा ना मिला
जो मिला ख़ुद से ख़ुद उसे ही ख़ुदा है मिला
पत्थरों से भरा रास्ता जब पत्तों से ढक गया
मुलायम और कोमल कालीन सा बन गया
ना चुभता ना गिरता ना सँभलता जब चलता
समझा तब में इस जीवन की सरलता
प्रेम के पत्तों की क़ालीन जो बिछा दूँ
इस पथरीले जीवन को फिर आनन्दमयी बना दूँ
कटाक्ष के काँटे और शब्दों के पत्थर
अब चुभने ना दूँगा, जब पाया ना अंतर
वो दिल में मेरे मकान बना गये।
मालिक रहे ख़ुद और किराए पे चढ़ा गये।
ख़ुद रहते गुम और किरायेदार पे शक करना
आदत सी बन गई थी उनकी।
एक दिन मेरी भी मकन मालिक से ठन गई।
वो ग़ुस्से में एक दिन मकान को तोड़ गए
जाने कहाँ चले गये वो मुझे छोड़ गए
समझ जिसकी जितनी वो उतना ही समझ पाता
वो नासमझ कैसे समझ हमे पाता
हम किताब का वो पन्ना नहीं हुज़ूर
जिसे छोड़ दिया यूँ मोड़ कर
कि कल पढ़ेंगे तुझे लखते जिगर, आज तू समझ नहीं आता
वो ख़ूबसूरती की बेमिसाल मूर्ति
इन्ही दो हाथों से जड़ा था उसको
कद्र होती अगर मेरी, ना शक होता क़ाबिलियत पर
वो इतरा के किसी और की बाँहों में ना जाती
कोई ज्ञान में कोई ध्यान में
क्या ढूंढ रहा तू हर इंसान में
कोई माया में कोई काया में
क्या डूबे हम सब अभिमान में
कोई वियोग में कोई रोग में
दुख कितने भोगे भोग में
कोई मंदिर में कोई मधुशाला में
ना मिला ख़ुदा ना खाला मे
ढूंढें कोई किताबों के पन्नो में
कोई भूली भटकी बचपन की गलियों में
जिस्मों में जकड़ी रूहों में
मौसम से बदलते मिज़ाजो में
अजनबियों में कोई अपनों में
कोई ढूंढें सच में कोई सपनो में
पर मिलती नहीं ज़िंदगी इतनी आसानी से
नहीं तो छू लेता उसे एक बार-२
ज़िंदगी तो बस एक आग़ाज़ है
एक खुली किताब जिसकी कलम मेरे हाथ है
लिखूँ आज मैं अपने कल को
कलम कर दे मेरे कल को, ये कलम-ए-अन्दाज़ है
ये ज़िंदगी असीम बेमिसाल है
घर बड़ा बहुत, पर ना कमरा ना कोई दीवार है
बस एक खुला असमां, अब ना किसी का इंतज़ार है
उड़े जो कोई पंख फैलाय उसमें
गाये जो अपना गीत मल्हार है
कुछ ना होकर भी सब कुछ है जिसमें
कभी मौज़ूद सच तो,कभी खाली ख़्वाब है
लगता कभी अपना, कभी भूला बिसरा ख़्वाब है
ये ज़िंदगी असीम बेमिसाल है
ये ज़िंदगी असीम बेमिसाल है
खुदसे रूबरू होने का एक मौक़ा है
रूह को रूह से मिलने पे किसने रोका है
जो सरहदें, उड़ते पंछी न देख पाते
जो बंदिशें, बेपरवाह प्रेमी को समझ न आते
अजी मैंने जी लिया है इसको, तोड़ के सब सरहदें और बंदिशें
अब कायनात भी देती मेरी मिसाल है
दारू बिन दोस्ती बिलकुल नकारा है
लेके दारू भागी में , मेरे दोस्त ने पुकारा है
दोस्ती की बस इतनी ही शर्त है
जो में रूठी तो तुम मनाओ
और तुम रूठे तो में नाचूँ और गाऊँ
जो नाचूँ गाऊँ तो खुश हो जाऊँ
जो खुश हो जाऊँ
फिर पेग बनाओ और तुम्हें बुलाऊँ
दारू बिन दोस्ती बिलकुल नकारा है
लेके दारू भागी में , मेरे दोस्त ने पुकारा है
शेर आते ही उनको हैं, जिन्हें महबूब नहीं मिलता
शेर आते ही उनको है, जिन्हें महबूब नहीं मिलता
महबूब जिसके पास है वो तो ख़ुद शेर बनके बैठा है
ये दुनिया की रामलीला यूहीं चलती रही
बातें यहाँ बनती बिगड़ती रहे
अरी बरसाने वाली यूहीं कृपा बनाए रखना मुझ पे
जब तक ये साँसे मेरी चलती रहे
दोस्तों की भीड़ में ख़ुद को अकेला पाते हैं हम
तनहा नहीं हैं मगर, ख़ुद से फ़ुरसत नहीं मुझको
वो भीख का मेरा कटोरा कोई भर नहीं पाया
वो दान मुझे कोई कर नहीं पाया
मैं ख़ुदा का बंदा हूँ यारों
जो ख़ुदा नहीं खुद वो मुझे समझ नहीं पाया
इसने कहा तो वो बन गया
उसना कुछ कहा तो वो बन गया
मेरी हस्ती मिली धूल में इस तरह
कभी काँटो सा चुभा तो कभी फूल सा खिल गया
प्रेम नहीं माँगो में
आधिपत्य या फिर तानो में
प्रतिफल की जो माँग करे
वो प्रेम नहीं व्यवसाय है
प्रेम बनो मत प्रेम करो
यही तो मेरी राय है
जो दूरी माँगे तो दूर हो जाओ
नज़दीकी में ये भूल ना पायो
तुम प्रेम हो सच्चा पर प्रेमी नहीं
प्रेम का दिया दिल में सबके जलाओ
वो सपने यहाँ देखता है कौन
वो सपने यहाँ दिखाता है कौन
ये तो जादू की मंडी है दोस्त
यह। सपने ख़रीदता बेचता है कौन
ज़िंदगी, जो उलझे सवाल समझ आते मुझको
तो प्रश्नपत्र बदल गया
ज़िंदगी, जो हल करने चलता मैं तुझको
तो मुसतदल (तार्किक ) दल-दल में फंस गया
अब सोचता नहीं जीता हूँ तुझे ऐ ज़िंदगी
दो पल की हो या हो पल भर की
तू हसीन दिलरुबा मेरी
बेवफा होने से पहले तेरे, बार-ए -खुदा (o lord ) मैं संभल गया
अपने राहें अलग हो तो कोई ग़म नहीं बस मंज़िल एक हो साहिब
ज़िंदगी में पल कम हो तो ग़म नहीं बस हर पाल में एक ज़िंदगी हो जनाब
होता नहीं कोई इंसान ग़लत
लगता अगर, तो शक है तुझे उस तक़दीर बनाने वाले पर
मुक़्क़दर बनाते है कौन
मुक़्क़दर लिखता है कौन
एक बार अगर मिल जाए
तो लिखवा लूँ तुझे मैं हर जन्म के लिये
माँगने मैं आया, फैलाकर दामन अपना
कुछ इस कदर दिया उसने -२
की हाथों से मेरे दामन ही छूट गया
जो करना हो किसी को माफ़
तो दूसरे की वफ़ा और अपनी बेवफ़ाई को याद रखना
में माफ़ नहीं कर पाया उसे उस दिन
जब उसके लब कह रहे थे मुझे माफ़ कर दो
पर आँखें बोली इसे यहीं साफ़ कर दो
वो पत्ता सूखे पेड़ पे आख़िरी साँसें ले रहा था
हवा के एक झोके ने दफ़ना दिया उसे भी ज़मीन में
ये ज़िंदगी क्या क्या रंग दिखलाती है
पर अपनी तो काला सफ़ेद देखने में ही बीत जाती है
बेशर्त प्रेम
फूलों की ख़ुशबू है बिखरी
पर माली नहीं दिखता
पक्षियों का मधुर संगीत है
पर साज़ बिठाने वाला नहीं दिखता
तस्वीर सी ये ज़मीन, रंगो से भरा आसमान
बनाया चित्र जिसने जगत का
वो चित्रकार नहीं दिखता
वो करता है सब कुछ
पर कोई दावा नहीं करता
वो गुमशुदा नहीं है,
उसे ढूँढा ज़ाया नहीं सकता
रख लो उसके कितने ही नाम
वो चाहता मुझे बेपरवाह
पर हर वक़्त जताया नहीं करता
———————————————-
होते दूर होते पास
सिमटता हुआ एक अहसास
फिर मिल पाए तुमसे ना शायद
आओ बना ले इस पल को कुछ खास
ज़िंदगी के सफ़र में मिलते है कुछ लोग
और आने जाने की ये लंबी सी डोर
है ड़ोर रिश्तों की जाने किस के हाथ
बस मोती पिरोता मैं यादों की उस डोर में
कोई गया मंदिर , कोई गया मधुशाला
किसे के हाथ में आ गया जाम, कोई थामे बैठा तुलसीमाला
जो अपने अंदर हर कोई झाँक लेता, तो इतना भांप लेता
हर कोई पंडित पीता जाम, और पूजा करती सबकी खाला
शब्दों की व्यर्थता जानी तब हमने, जब रोक ना पाए उसको जाने से
व्यर्थ चिंता में समय गवाँया , कौन रोक सका समय को आने से
गहरा प्यार लाये वासना का बादल , बादल में भरा सारे संसार का दुख
बादल दुःख का प्रेम बन बरसा, फिर तपते मन में करुणा का अंकुर गया फूट
नाराज़ होता नहीं ये दिल तुझसे, चाहे तोड़ा हो तूने कितनी भी बार
ख़ामियाँ जो नज़र आती है इसे अपनी इतनी , तो फिर कर बैठता है तुझसे प्यार
कौनसी यहाँ पूरी उम्र गुज़ारनी है
की परवाह हम करें और किसकी
किसी ने हमारे मन को छूआ
और किसी ने दिया छिटकाये
दिन रात किसी ने हमे है पूछा
कोई पल में पीछा छुड़ाए
किसी ने कहा आपके विचार स्वछंद
कोई व्यभिचारी कह स्वतंत्र कर गया
समझा न कोई मेरे सब्र की सीमा
अभिमान से किया ये स्वाभिमान विच्छंद
स्वाभिमान कोई असीम भर गया
मान हानि का दवा कोई करता
मनमानी कर आंसू कोई भर गया
बेहोश जी रहे थे हम कुछ ऐसे
कोई नादानी कर, हमें होश में कर गया
कौनसी यहाँ पूरी उम्र गुज़ारनी है
की परवाह हम करें और किसकी
रास्ते कितने भी अलग हो
पर मंज़िल सबकी एक है
तक़दीरों की लकीरें कितनी ही अलग हो
पर लिखने वाला एक है
ज़िंदगी एक रास्ता
एक मोड़ पे जो तू मिला
फिर रब से मैंने की दुआ
ये रास्ता यूहीं चलता रहे
कारवाँ मोहब्बत का बढ़ता रहे
हम बढ़ रहे थे साथ तेरे
पर मोड़ ऐसा भी एक आया।
तू चल रहा था साथ मेरे
पर रास्ता अब अलग-थलग था
रास्ता एक था और में पीछे चल रहा था
उन्हें लगा में पीछा कर रहा था
जो एक मोड़ आया
मैंने भी पीछा छुड़ाया
ग़लतफ़हमी के नरम पत्तो पे चलने से अच्छा था
सच्चाई के पथरों पे बिना उसके चलना
आँधी आयी है , फिर तू पकड़े रह मेरा हाथ
पुराने ज़ख़्म ना तू उघाड़, आंधी के जो कण जाएंगे
भरेंगे नहीं बल्कि नासूर बन जाएँगे, अपने पुराने घाव
ये मन जब तन से भर गया, तो चक्षु सब खुल जाये
सब कुछ दीखन लगे तुझे , पर सच तू जान ना पाए
जो सुख देता दुलार वो करता
दुख में अपनी कृपा से भरता
नया जब होता रास्ता तो लंबा भी लगता और डर भी लगता
में इधर देखता, में उधर देखता
पाता खुद को अकेला
मुँहल्ले की गलियाँ नापी हो जिसने
वो अब दुनिया जीतने चला है
Alexander the great के बाद मेरे दोस्तों
आती इसे ही ये कला है
We r here to free each other
from the fears we are trapped in.
I am free, hope so do you.
थोड़े डर भी बनाये रखना
इंसान बने रहने के लिए
वरना पूज दिये जाओगे भगवान की मूर्ति की तरह
Let life give you black and white canvas
But you carry your own shades
And color its canvas
कुछ होने को होता हर कोई पैदा ।
फिर आजाता परिवार ,
रिश्तेदार और समाज।
अब नर्तक बिन क्या बनेगा ?
उँगली पर सबकी दिन रात,
नाचेगा वो ता था थाइया
वो कोशिश बहुत की
पर नाकामीयाब रहा में
जो कोशिश में करता तो चाँद छू आता
पता नहीं कैसे प्यार करूँ तुझको
वो दरिया हर खाई पार कर गया में।
वो डूबा ना होता विराह के समुंदर में
जो कोशिश में करता तो पार लग जाता
पता नहीं कैसे प्यार करूँ तुझको
जो मिल ज़ाऊँ उसमे तो वजूद ना मेरा
अलग होने में मैं रजा नहीं है
जो मिल जाए वो मुझमें, तजुर्बा ना उसका
साथ रहना अब सज़ा लग रही है।
श्याम तेरी लीला में समझी ना श्याम
कभी लगे अपना, पराया कभी श्याम
यमुना के तट पे में रोऊँ धीरे धीरे
आके कन्हैया पोछे नयन जो भीगे
करे कान्हा - २ इतना प्यार और दुलार
कैसे तुम-२ लगाओगे प्रेम का कोई दाम
जो माँगी पूरी करी सारी मन्नत
माँगी नहीं वो दिखाया है जन्नत
मेरा दिल-२ ऐसे ना उसका ग़ुलाम
करूँ उसकी सेवा में सुबह हो या शाम
विपत्ति ऐसा रास्ता है कि कोई काम नहीं आता है
चलना अकेले है भगवान ये याद कराता है
विपत्ति एक ऐसा रास्ता है जो भगवान तक ले ही जाता है
कोई साथ ना दे तो फिर वो ही नज़र आता है
उस आग में तपना होता है
जलना होता है
आगे बढ़ना होता है
ज़मीन का रॉकेट ऐसे ही आसमान नहीं छूता है
सब कुछ जो आता ज़हन में
कह देना मुनासिब नहीं
ये मन तो हर दिन बकवास करता ही रहता है
और की चाह ही
ले जाती पाताल
छुआ देती आसमान
बेचैनी से भर देती
ज़िंदा लगते हैं हम
जब चाह ना बचती
तो बैठ ज़मीन पे
आलथी पालथी मार
अब समाधिस्थ है हम
कुछ करने से पहले करना एक सवाल
क्यूँ? क्यूँ करूँ में ये
जवाब में जलन की ज़रा भी बू आये
तो मत करना
ख़ुद को पाने की चाह में चाहा तुझे बहुत
ना पा सके खुद को , और तुझको भी खो दिया
खिंचाव बड़े खूबसूरत होते है, बस खोने ना पाए
अगर खो गए कभी तो, ना वो रह पाये और हम मर जाये
खिंचाव ज़रूरी है रिश्तों के धागों में
पर ज़्यादा हो जाये तो टूटने का डर
और कम हो तो उलझने का डर
पत्थर पे छेनी ना पड़े तो कैसे निकले भगवान
चुनौती से भरा जीवन ना हो तो निखरे ना इंसान
जो आग में तपे ना मटकी तो भरियों कैसे पानी
जो अहंकार में ना जलियो तो कैसे मीठी बने वाणी
ख़ुदा ने बख्शी ग़र काँटो भारी ज़िंदगी है
तो एक फूल की भला हिफ़ाज़त कैसे करता
में आया मेरे पास कुछ पाने
तू आया सब कुछ लुटाने
तूने लुटाया बहुत
मैंने पाया बहुत
तेरा तुझ से कुछ नहीं छिना
ख़ाली झोली भर पाये ना दीना
ना पाया कुछ ना गवाया कुछ
मोड़ ज़िंदगी का ऐसा भी आया
ग़ुस्सा भी ज़रूरी है संबन्धों में कई बार
दाल जल जाती है अगर हिलायी नहीं जाए वक़्त पर
छूने की पाने की समेटने की चाह छोड़ ए काफिर
बस एक निगाह जी भर के देख ले मुझे
एक छोर ज़िंदगी की पकड़ा दे
उन अनजाने हाथों में
जो जानता तुझे तुझसे ज़्यादा
फिर बहा ले ज़िंदगी
किनारे की अब किसे परवाह है
कोई उसे नचा रहा कोई मुझे नचा रहा
डोर कहीं किन्ही हाथों में
कमबख़्त इल्ज़ाम किसे दें
ग़र नाटक में मज़ा ना आ रहा
कहते हैं उम्मीद पे दुनिया क़ायम है
हमने उम्मीद करनी छोड़ दी, अपनी दुनिया ख़ुद ही तोड़ दी
कहते हैं जैसा करोगे वैसा भरोगे
भाव करता का में ना करूँगा , फिर भला में क्यों भरूँगा
कहते हैं सच्चे का साथ भगवान देता है
रचने वाला एक निर्माता, फिर झूठे को बनाया किसने
कहते हैं कर्म ही पूजा है
हर वक़्त माला जपना, कुछ सच नहीं सब सपना
बस मीठे पानी को हम तरसे तहां ज़िंदगी
कमबख़्त हर कोई खारे पानी की झील निकला
अंधेरे की अपनी शान होती है
उसकी एक पहचान होती है
फूटता कैसे बीज
फिर बनता कैसे पौधा
कैसे यौवन फलों का हम सब पे बरसता
अगर अंधेरा नहीं होता
गर्भ के अंधेरे में ही
हर जीवन है पनपता
कैसे पाता वो प्राण
अगर अंधेरा नहीं होता
रात में चमकते तारे जब याद दिलाते
कोई देखता नानी, दादी कोई देखता
कैसे मिलते उनसे हर रोज़
अगर अंधेरा नहीं होता
जीवन में संघर्ष चुनौतियों को सलाम
दोस्तों से ज़्यादा मैं दुश्मनों को संजोता
मैं कैसे मिलता ख़ुद से
अगर अंधेरा नहीं होता
ज़िंदगी का साज़ बिठाना हो तो थोड़ा ख़ुद को एयर सबको थोड़ा तो कसना पड़ता ही है!
सम्भाले है तूने मुझे इस कदर
जैसे नरम पत्तों में छिपी नयी कोपिले, रहती हैं महफ़ूज़
भुनती मूँगफली और पीसती इलाइची
ज़िंदगी का फ़लसफ़ा समझा गये
जब तक संघर्ष की आग में जले नहीं
दुविधाओं के पाटे में पिसे नहीं
तब तक ना आप में स्वाद आता
और ना ही ख़ुशबू
कभी सोचा ना था ऐसा भी होगा
सीने से लगाए रखता था जो
अब chewing gum की तरह छुड़ाता है मुझको
बड़ी सादगी से घर कर गये, वो मेरे दिल, मेरे घर में
और क़ैद कर लिया मुझे मेरे ही घर में
संभलना आसान होता है बदलते मौसम में
कभी महबूब के बदलते मिज़ाज का मज़ा तो लीजिए
नाटक है साहब
इतना रोते क्यों हो
मुँह लटकाये अपने
गंभीर होते क्यों हो
निभाओ कारीगरी से किरदार अपना अपना
चले जाना है एक दिन सबको,
ये मंच यहीं छोड़ के
अब पीछे जाना मुनासिब नहीं
और ये पाल मनमुताबिक नहीं
रुकते कदम फिर चल दिये
जब तक कर लूँ सब हांसिल नहीं
ज़िंदगी में सब कुछ होके भी कुछ कमी सी लगती है
सूख गये सब आंसू पर फिर भी आँखों में नमी सी लगती है
बहुत जलता हूँ उस रेडी वाले से मैं
पाया नहीं ज़्यादा
पर खोया मुझसे बहुत कम
वक़्त बेहिसाब उसके पास
निर्भयता और बदतमीज़ी में थोड़ा ही भेद है
जैसे पानी और शराब
एक जीने के लिए ज़रूरी
और दूसरे बिना ज़िंदगी अधूरी
वो रहगुज़र खड़ी विधवा सी
राह तकती शायद किसी की।
मैं समझ के खुद को मलिक उसका
चल पड़ा दिल में बड़े अरमान लिए
फिर मिले कुछ पुराने राहगीरों के निशान
कुछ मसले हुए फूल
कुछ उजड़ी दुकान
कुछ टूटे हुए मकान
मलिक नहीं था मैं उस रहगुज़र का
अकेला नहीं था मैं इस सफ़र में
गुज़र गए थे बहुत, मुझसे पहले भी !
संगति का असर पड़ता है जनाब
कभी धनिया पुदीना चोंट के देखना
छिपी क़ाबिलियत का रंग तब तक नहीं आता
जब तक कुटाई पिसाई ना हो
मेहँदी की पत्तों की तरह
डिग्रियाँ बड़ी इकट्ठी की उसने
काश सब्ज़ियाँ उठाना भी सीख लेती
बहुत नाज़ों से पाला था उनको
चोट हमे लगती और दर्द उनको होता
उनके तोहफ़े और बातों के नहीं
ख़याल रखने के अन्दाज़ के क़ायल हैं हम
शब्द पत्थर से हो तो ही चोट करते हैं
चोट खा खा कर पत्थर से मूर्ति बनती है
सपनों को टूटते
अपनों को छूटते
सच को बदलते
और गिरते को संभलते देखा है मैंने
डरपोक नहीं
बस तेरे जैसे बेख़ौफ़ शौक़ नहीं रखता
मिलता प्यार भरपूर और सच
एक बार जब आप आते हो
और जब आप जाते हो दुनिया से
बहुत देख लिया हो वक़्त सी पहले
तो ज़िंदगी एक सज़ा है
मिलता नहीं कुछ वक़्त से पहले
ले लो ज़िंदगी का मज़ा है
डूबता ढूँढता किनारा
में भी ढूँढता सहारा
पर सब यहाँ बेसहारा
मिलता नहीं किसको ना किनारा
बुड्ढे मुझे पसंद नहीं
वो छीन लेते हैं बचपन
अपने तजुर्बों से
सले मशवरों से
गाली दो या गले लगाओ
बस तुम बीच से हट जाओ
करने दो काम उस परवर दिगार को
तान के चादर फिर सो जाओ
पता नहीं था क़ीमत चुकानी पड़ती है
दूसरों से मिली ख़ुशियों की
भीड़ में जन्मा, मैं बस एक नाम भर
खाता दर बदर, ठोकर इस कदर
दुनिया एक, ग़ज़ब का मेला
भीड़ में मैं कितना अकेला
दोस्ती क्या होती, नहीं किसी को है पता
रूठ जातें लोग, गहरा अपनापन भी है सज़ा
ख़ाली पड़ा रहता, मेरे दिल का ये ठेला
भीड़ में मैं कितना अकेला
कितने यहाँ आये, और कितने गये
वक़्त आने पर जाने कहाँ चले गए
कितने भगवान को, प्यारे हो गये
रुकता नहीं, ज़िंदगी का ये रेला
भीड़ में मैं कितना अकेला
हार गया ,कोई जीत गया
ये दिन भी ऐसे ही बीत गया
खेलता रोज़, हर कोई ये खेला
भीड़ में मैं कितना अकेला
इसको मानो ,उसको जानो
जगत है माया, रह समय तुम ध्यानो
गुरु कहाँ, जब मिले ना चेला
भीड़ में मैं कितना अकेला
दोस्ती का कंबल ,ओढ़े दुश्मनी
अपनो में रहकर, अपनों की कमी
रिश्तों के नाम पे क्या क्या ना झेला
भीड़ में मैं कितना अकेला
काश वक़्त रहते दिल में उन्हें जगह दे पाता
अब तस्वीर में, मेरे तसव्वुर में रहते हैं वो
सब्र करते करते कब्र ना बन जाये
तेरी मेरी और अपने इश्क़ की
इंतज़ार करना छोड़ दिया मैंने
जब उस रहगुज़र पर एक मोड़ आया
किसी और की नहीं
जीयो अपनी ज़िंदगी
नाटक है क़ादिर
अपने किरदार में रहो
जब चाहत से बदलकर ज़रूरत में बन गया
तो शराब भी पानी की तरह पीने वो लगा
मेरी नाराज़गी तुमसे कभी ना थी
ग़ुस्सा कभी ना था में तुमसे
वो कुछ अधूरे ख़्वाब और कुछ टूटे सपने नाराज़ दे तुमसे
अब मन नहीं करता शायरी या शिकायतों का
कोई दोस्ती कर ले या रंजिशें निकाले
हमने उसे रोका भी नहीं
उसने पलट कर देखा भी नहीं
बीता वक़्त वापस आता नहीं
बहुत ज़रूरी है ये पता करना
की क्या नहीं है करना
सबको हाँ कर दी तो
ग़ुलाम अली से ग़ुलाम बन जाओगे
दुनिया भी ग़ज़ब तमाशा है
कोई भागता २ वक़्त की रोटी को पाने को
और कोई उसको पचाने को
आखिर क्यों
मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी तू रावण का अभिमान भी तू
तो मंदिर में पूजा सिर्फ राम क्यों जाता है
रात का घना अंधेरा भी तू दिन का चमकता सूरज भी तू
तो डर अंधेरे से ही लगता क्यों
माँ का दुलार भी तू, पापा की फटकार भी तू
तो डाँट में आंसूं बहाता क्यों है
दीपक की ज्योति भी तू, जलती हुई बाती भी तू
तो पंडित सिर्फ़ ज्योति दिखाता ही क्यों है
आसमान में अंधेरा भी तू, टिमटिमाते तारे भी तू
तो तारें में अपनी नानी खोजता क्यों है
गर्मी में बरसती आग भी तू, सावन की बरसात भी तू
तो मोर बन सिर्फ़ सावन का नाचता क्यों है
फूलों की कोमलता भी तू, कांटो की निर्दयता भी तू
तो फूलों को ही मिलते तेरे दर्शन क्यों है
दानी के हाथ भी तू, चोरों की जमात भी तू
तो दानी ही पूजा क्यों जाता है
मन की करुणा भी तू, इस तन का दुस्साहस भी तू
तो करुणा को ही जग में पूजा जाता क्यों
महकाने में रंग बिरंगी शराब भरी बोतलें मुझे बुलाती हैं
फिर सजती सवरती, पैमानें में भर मेरे पास चली आती है
आँसुओं में पीता हूँ, ठहाकों में भी पीता हूँ
ज़िन्दगी को तो छोड़ो
ये मौत भी ना पाएगी मुझे समझ
हर हाल में मैं, हर पल को जीता हूँ
जब मुहबत उसकी रंजिश में बदल गयी
तो ख़ामोशी भी खंज़र सी चुभने लगी
शिकायत भी किससे करूँ
हर जगह तू ही है
बहुत ख़ता था में सबसे, जब तक जाना नहीं
लोग नहीं बस विचार बदलते है वक़्त के साथ
वो अब मेरे समय का भूखा नहीं था
बात समझ गये हम दोनों अब समय बहुत कम था
जो वो इतना समझ जाता कि प्रेम की गहरायी में डूबा ja सकता है
तो ऊँचाई में उड़ा भी जा सकता है
सब नज़रिए का फेर है
अब देखकर उसे भूख नहीं दान देने को मन करता है
उसके प्यार करने का अन्दाज़ सबसे अलग था
कुनकुना पानी सा नहीं
उबलता लावा सा हर वक़्त था
अगर चार लोग भी गाली ना दें
तो जीवन अच्छा जिया पर सच्चा ना जिया
महफ़िल में ही हो रही थी मेरे क़त्ल की त्यारी
जो पहुँचा तो बोले बड़ी लंबी उम्र है तुम्हारी
बात रीति रिवाज़ो की होती
तो जितने लोग उतने
I don’t want you to know yourself
I don’t think you know yourself
All I want you to know
That you know
That you don’t know yourself
ये जीवन सपना है
या सपने में चल रहा जीवन है
जो भी है हर हाल में
एक दिन टूटता है
और सब कुछ छूट्ता है
ज़िंदा हूँ क्यों मैं
क्या ख़ुद को पाने को
या सब भुलाने को
याद कर जीता जो चले गये अपने
हर दिन मरता पूरे करने को सब सपने
औरों की ख़ातिर ये जीवन जलाया
अपनों में ग़ैरों का अक्स देख नहीं पाया
ख़ुद का संभलना है कितना ज़रूरी
जितना सहारा ग़ैरों को दे पाया
ख़ुद को सम्भालिये कितनों कीबैसाखी हैं आप
सैलाब आ जाता है अगर बढ़ जाये सूरज का ताप
पाने की चाह में उसको खो दिया ख़ुद को
ना मिला वो ना मिल पायी ख़ुद से
काश
दोस्त बहुत नहीं थे उसके
सच बोलने की बुरी आदत जो थी
पेड़ों से दोस्ती हो गई है मेरी
बुरा नहीं मानते २ गाली भी दे दूँ। तो
ख़ुद को पाने की तलाश में भटकता पेड़ों के बीच
फिर लौट जाता हूँ ख़ुद से दोस्ती करके
प्रेम पूरा तभी होता है जब आधा अधूरा होता है
वरना मिलती ना जगह अधूरे चाँद को भोले के माथे पे
लोगों को अक्सर कहते सुना है
वक़्त की बहुत कमी है
कभी ख़ाली बैठ के देखो
भर देगा तुम्हारा कोना कोना
ऐ ख़ुदा एक सीमा होती है तजुर्बों की
बहुत पका हुआ फल सुगंध नहीं गंध ही देता है
रोटी दोनों तरफ़ से सिके तभी स्वाद देती है
रिश्ते दोनों तरफ़ से निभें तभी बात बनती है
ग़रीबी में देख लिया
अमीर होके देख लिये
मंदिर जाके देख लिया
मधुशाला में पीके देख लिया
कुछ पाके देख लिया
कुछ खो के देख लिया
किसी को अपना बना के देख लिया
जुदा होके भी देख लिया
सबका होके देख लिया
नाते तोड़ के देख लिया
अब देखना है ख़ुद में
रहना है अपने साथ
पाया सब खुदी में
दुनिया जहां में देख लिया
में ख़ुद को मुमताज़ समझ बैठी थी
वो दिखावे की दुनिया का शाहजहाँ जो ठहरा
तक़दीर में मेरी ताजमहल लिख दे
दफ़ना दे मुझको, करे कोई इश्क़ हमसे भी इतना गहरा
छिपा के रखना अपने महबूब को पलकों में
यहाँ पलक झपकते ही चुरा लेते हैं लोग
अगर होती दुनिया सबके लिए एक जैसी
तो मुझे मुजरिम और तुझे बेक़सूर ना ठहराया होता
दुनिया में होता कोई अगर अपना
सच हो जाता जो चल रहा ये सपना
एक रिश्ता उसूलों के सूली चढ़ गया
मेरी बेचैनियों की वजह तू नहीं
मेरी बेचैनियों की वजह से तू था
जब पाया ख़ुद को बिलकुल अकेला
तू तो ज़िंदगी में बेवजह ही था
बड़े प्यार से बनाया था मैंने आशियाँ अपना
फिर टूटते पेड़ से घोंसले को गिरते देखा
तुम्हारी सुनायी हुई बातों पर भरोसा नहीं हमको
तुम्हारी सुनायी हुई बातों पर भरोसा नहीं हमको
एक कहानी के लिये दो किरदार तो लगते हैं
महबूब अब दूरी बनाए रखता मेरा
सुबह उठ कहता क्या चाँद सा चेहरा तेरा
उसकी नज़रों का कमाल था
की ख़ुद को समझ बैठे हम शराब विलायती
उसक प्यार का अन्दाज़ बेमिसाल था
और हम बैठे ठेठ गंवार कायनाती
उसके रुखसार पर तिल बहुत थे
ख़ूबसूरती की पहरेदारी के लिए दरबान तो बैठाने पड़ते ही हैं
बड़ी ख्वाहिश थी कुछ कर गुजरने की
फ़क़ीरों
क्या कुछ नहीं पाया पर बहुत कुछ खोया
ख़ुशी की धागों में मैंने आँसुओं को पिरोया
मिट्टी थी विलायती देसी बीज उस्मे बोया
जागा तो सब लूट गया, बड़ी गहरी नींद मैं सोया
कहाँ कोई अपनों से छूटकर रिश्तों से रूठकर खुश रह सका है
कभी पतझड़ की सूखी पत्तियों से पूछना
सच नहीं बोलो तुम मुझसे
तुम बस झूठ ही बोलते रहो
कुछ पल और जी लेने दो मुझको
कभी भी परख लेना पारखी नज़रों से मुझे
मैं सोना हूँ पारस की ज़रूरत नहीं मुझे
कभी बादल की तरह जी के देखो
बदलो समय पर और बहो हवा के साथ
बदलने में तुझको ये उम्र तमाम की
काश कुछ समय ख़ुद को समझने में लगा देता
ख़ुदा ने कभी साथ छोड़ा नहीं था मेरा
मैं नासमझ ही उसे एक मॉड पे छोड़ आया
ज़िंदगी के बाज़ार में क्या नहीं मिलता
बस हर तरफ़ ख़ुद को में ढूँढता फिर रहा हूँ
ना गिला रहे ना शक शिकवे बचे
जो बैठे देखा उस ख़ुदा को तुझमें
इस बाज़ार से बहुत मुखौटे ख़रीद लिये हैं मैंने
राम नहीं अब रावण बनने की तैयारी है
हर बात पे जिसके आँसू आते हैं
अभी ख़ाली पन्ने जैसा मन रखते हैं वो
उसकी मोहब्बत की जंजीरो ने कुछ जकड़ा था ऐसे मुझे
की लोहे के पर उगा लिए मैंने
वो खुदा उतरता उसकी ज़ुबान से
कभी तारीफ़ों के पुल बनाता, कभी सब्र के बांध तोड़ जाता
बीते पलों के एहसासों को जब भी समेटती हूँ
वो उतर आता है एक और शायरी बनके
एहसान मानती हूँ तेरी बेवफ़ाई का
ख़ुदा से मुलाक़ात करा दी मेरी
दुनिया के लिए ख़ुद को बदल दिया इतना
की अब मेरा अक्स भी मुझे पहचानने से इनकार करता है
कोई पूछने आता नहीं मुझे मेरे घर में
सोचता हूँ तस्वीर में घर बना लूँ अब
उसकी यादें उसकी तरह बेवफ़ा ना निकली
बहुत साथ दिया तनहाइयों में मेरा
अगरबत्ती महका देती है महफ़िलें कितनी, जब जलाई जाती है
तू भी जला जिश्त खुदी में, महका आशियाना अपना
तेरी यादें जब बेवफ़ा हो गई
तो आँसू आये मुझसे वफ़ा दिखाने को
एक अरसा तेरी तस्वीर के साथ सोयी
आरज़ू थी तुझमें समाने को
पहली बार होने का एहसास जुड़ा होता है
शिकवे में शैतान, मोहब्बत में महबूब ख़ुदा होता है
ये शराब क्या ना करा देती है
अधूरी ज़िंदगी को भरी महफ़िल में छलका देती है
ये शराब क्या ना करा देती है
दोस्तों से दुश्मनी और दुश्मन से दोस्ती करा देती है
ये शराब क्या ना करा देती है
शामें रंगीन और सुबह टांगीं
उनके प्यार में बड़ी गहराई रही होगी
आज तक निकलने का रास्ता ढूँढ रहे है।
आख़िर इस प्रेम को मंज़िल मिल ही गई
अब पूछता नहीं वो आने में इतनी देर कैसे कर दी
उसकी ख़ामोशी में गूंज बहुत थी
हम नाहक ही शब्दों के ढोल बजाते रहे
सुना था प्यार में लोगों के पर लग जाते है
पर मेरे तो सोने के पर निकले
अपने को ढूँढते ढूँढते बहुत दूर निकल आया था
पता नहीं कब सब पीछे छूट गया
चाहकर भी वो होता नहीं जो हम चाहते हैं
हो जाता अगर तो इस ख़ुदा को पूछता कौन
उस दिन ख़ुद को पाकर उसको खो दिया मैंने
बड़ा महँगा सौदा कर लिया
ताली दो हाथ से बजती है तो ही ताली होती है
एक हाथ से तो बस थप्पड़ ही लगता है
वो मेरा महबूब ख़ुदा बन जाता
बोलता नहीं कुछ बस सुनता रहता
सपनों के धागे में पिरोती और वो बुनता रहता
वो खुदा मेरा कभी देता इतना कि सँभाला ना जाये
और कभी लेता इतना कि संभला ना जाये
पर तो हमारे भी थे
बस सोने के थे तो बेच आये तेरे शहर में
उसने इबादत में माँग लिया मुझको ख़ुद से
वो मेरा ख़ुदा बन बैठा
एक अरसा लगा हमे हम होने में तुम्हें तुम होने में
बहुत झांक लिया ग़ैरों की गुरुफ़ातों से
सोचता हूँ क़ादिर जाऊँ तो जाऊँ कहाँ
ना कोई गिरफ़्त बची ना कोई गिरह
उन मकड़ियों के जालों ने लपेट लिया था हर और से
और तुम याद आए
साक़ी भरता बिन पूछे जो प्याला
और तुम याद आये
बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं था
कभी कलम नहीं मिली कभी कलाम नहीं हुआ
मेरे तसव्वुर से तस्वीर उसकी धुंधला रही थी
वो तो अब भी लगती क़यामत मेरे दोस्तों
बस मेरी ही उम्र बढ़ती जा रही थी
बहुत इंतज़ार किया उसका इस जिस्म ने इस रूह ने
सब थक गये एक इंतज़ार के बाद, बस मैं नहीं थका
चालीस पन्ने थे मेरी ज़िंदगी की किताब में
उसने बस आधा पढ़ा और
हर कोई यहाँ जीना चाहता है
बस क़समें मरने की लेते हैं मुहब्बत में
कोई अनजान तारीफ़ें कर गया मेरी
और मेरे अपनों को अनजान बना गया
बहुत नाज़ुक होते हैं इंसानों के रिश्ते
कोई फ़रिश्ता ही चाहिए इन्हें निभाने को
झूठे बर्तनों में कौन खाना पसंद करता है
पर परोसते हैं रोज़ ख़ुद को हम झूठे मन से
एक ख़ाली जाम की तरह हूँ में
पहले अकेले में भर लेता था ख़ुद को उसके प्यार से
अब तो भरी महफ़िलों से भी आधा ही लौटता हूँ
ख़ुदा, बनके शैतान उसमें
मिला गया मुझको मेरे ख़ुदा से
रोना कोई चाहता नहीं पर रोतों को पसंद बहुत करते हैं लोग
हसनें से डरते हैं कहीं ख़ुशियाँ बिखर गई तो कोई समेट ना ले जाये
रिश्तों में कुछ दूरियाँ बनाये रखो
तो पास होने का एहसास बना रहता है
ढूँढता jise पत्थरों में वो मिलता नहीं मांस मज्जा में
जब ख़ुद में ढूँढने चला तो में पत्थर का निकला
बात नहीं करते वो
पर नाराज़ हो जाते हैं
ये अन्दाज़- ए- आशिक़ाना है उनका
जब से जाना तू कोई खोयी हुई रूह है मेरी ही तरह
अब ना तैश होता ना तरस आता
में माँगता रहा हर वक़्त तो कैसे उसे पाऊँ में।
वो है जो बन माँगे हर फ़रियाद मेरे पूरी करता है
बहुत आगे निकल गया था में
की अब अपने पैरों की टापें भी सुनाई नहीं पड़ती थी
खुश है कौन यहाँ -२
कोई उखाड़े दफ़न सीने में दर्द को तो पूछ लें
कोई उतारे १० निक़ाब चेहरे से अपने तो पूछ लें
कोई रुके और पकड़ने दे अपना हाथ तो पूछ लें
कोई करदे दिल के हज़ार टुकड़े तो पूछ लें
कोई उम्मीदों का हिजाब हिया से उतारे तो पूछ लें
कोई ख़ुसूमत (animosity) का खंजर सीने में ना डाले तो पूछ लें
कोई हिज्र में मेरी रातों का हिसाब ना माँगे तो पूछ ले
और उस दिन चलते हुए अकेले किसी से मुलाक़ात हो गई
वाह क्या दोस्त हूँ में मेरा
रिश्तों को नादानियाँ नहीं ज़्यादा नज़दीकियाँ बर्बाद करती है
हम नादानी में इतने क़रीब आ गए
की आईने में भी उनका अक्स दिखता था
की हिचकी उन्हें आती और पानी हम पीते
एक बार ख़ुद से रूरबरु होने में चला
तेरी गली से बैआब्रू हो में चला
और गया निकल कुछ इस कदर सबसे आगे
ख़ुद को भी पीछे छोड़ फिर में चला
नफ़रत से कौन जीत पाया है किसको
और इतना प्यार करने की हिम्मत किसमें है
नफ़रत करने को भी एक दिल चाहिए
इस दिल को प्यार करने से फुर्सत ही कहाँ
बहुत खूबसूरत होती ये ज़िंदगी
अगर लोग उम्मीदें कम और उम्र भर निभाने की कोशिश ज़्यादा करते
बातें बिगड़ने में एक लम्हा नहीं लगता
बनते बनते बातों को एक उम्र लग जाती है
ये गीला तकिया बह गया है काजल जिसमे
अब तो बेजुबान चीज़े पूरी दास्तान कह देती हैं
ताह उम्र बिता दी ये जानने में वक्त जाया ना करो दूसरों को जानने में !
वक्त निकालो और ख़ुद को जानो
ताउम्र पड़ी है दूसरों को जानने में।
जिसे ढूँढता रहा में कभी इसमें कभी उसमें
जब ख़ुद से मिला में तो वो भी मिल गया
कभी इसमें कभी उसमें
इंतज़ार करेंगे जिस दिन पढ़ पायेगा तू
मेरे लफ़्ज़ों केक बीच छिपे ज़ज़बस्तों को
ये रिश्ते रूहों से शुरू और ख़त्म होते है
जिस्म तो बस एक ज़रिया है
मेरे लिए प्यार और उसके लिए नफ़रत करना आसान था
मुश्किल सफ़र अपनाता है कौन,
जिसके लिए जो सफ़र आसान था
वो उसका ही मुसाफ़िर था
में प्यार और वो नफ़रत करने में माहिर थाह
दोनों छू रहे थे बुलंदियों कुछ इस तरह
की हारना अब किसी का भी मुश्किल था
हम बेख़बर काली नज़रों से
करते रहे प्यार का इज़हार सरेआम
बहुत लड़ाई हुई हम दोनों के बीच एक पथर को लेके
वो कहता ये मेरी मूर्ति है और में कहती ये सबके भगवान है
वो बारिश की बूंदे बड़ी ज़ोरों से पकड़े थी तार को
वो तूफ़ान आया था उसको गिराने को मिटाने को
पूछो हुस्न की मल्लिका से
चढ़ती जवानी बढ़ते क़द्रदानों का अपना एक नशा है
सपनों के सौदागर से तो पूछो
बिकते सपने जितने बढ़ता उतना नशा है
एक रईस की आँखो में सोने की चमक तो देखो
विरासत में मिली वसीयत का नशा अलग ही होता है
चंद पन्नो पे छाप कर अपनी ही ज़िंदगी की कहानी
लेखक कलम से ही अपनी नशा कर लेता है
बच्चो को डाँट कर घर गृहस्थी में हर दिन झूंझ कर
रात का सरदर्द औरत को नशे में चूर कर देता है
कोई बात नहीं, वो देखे दिन या रात नहीं
बीवी से उलझने में आदमी होने का नशा ही कुछ और होता है
नशा बहता नहीं सिर्फ़ जाम में , नस नाड़ियों में सबकी बहता है
पूछो अपने रोम रोम से, कौन सा नशा तुम्हें मस्ती देता है
दो तरह के नहीं हर तरह के लोग होते हैं
बस आँखें एक तरह की चाहिए सबको समझने को
में मोहब्बत का सुरूर नहीं। जुनून सा ज़रूरी था उसके लिए
जब जुनून उतरा तो ही मुहब्बत बुलंदियों को छू पाया
आजकल नया इश्क़ हुआ है उन्हें
शराब ने जगह ले ली है मेरी
इंतज़ार रहेगा बेवफा हो, रुखसत होगी वो जिस दिन
तुर्श रुखसार ( ill nature bad temper) मिज़ाज भी भायेगा मेरा
जो बदल जाये जुनून के साथ ऐसा इश्क़ तो इंसान करते हैं
फ़रिश्ता बनना हो यो फ़रिश्ता ही चाहिए दिल लगाने को
काश मुहब्बत के मकान तक मैं पहुँच पाती
बस जुनून की सीढ़ी से चढ़ी और उतरी
नशे में हर वक्त मैं रहती हूँ
अब साक़ी महख़ाने की ज़रूरत नहीं
लोग कहते है आप पीते नहीं
हाये कैसे आप जीते नहीं
बोतल पी जाती हूँ पूरी
पर किसी को पता चलता नहीं
मेरा साकी मेरे अंदर रहता है
वो जाम बनाये, पिलाये वही
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